Friday, September 20, 2019

दिल्ली में गूंजे मीरा के भजन

सिरीफोर्ट ऑडिटोरियम में मीरा द म्यूजिकल शो दर्शकों को भक्ति के भाव से सराबोर कर गया। 90 मिनट की प्रस्तुति के दौरान शायद ही कोई दर्शक अपनी सीट से उठा हो। जो यह बताने के लिए काफी है कि किस कदर दर्शक इस कार्यक्रम में खो गए थे। करीब 183 कलाकारों की बेहतरीन प्रस्तुति दर्शक ताउम्र याद रखेंगे लेकिन उससे भी ज्यादा कौतुहल दर्शकोंको यह जानकार हुई कि करीब 90 फीसद कलाकारों ने पहली बार स्टेज पर प्रस्तुति दी है। उसमें से भी 70 स्कूली बच्चे थे।

https://en.wikipedia.org/wiki/Meera

राजघराने का ठाठ
ऑडिटोरियम में मानों राजपूतानी शानो शौकत जीवंत हो उठी हो। स्टेज पर लकड़ियों से बना किला एवं एलईडी स्क्रीन का इतना बेहतर प्रयोग किया गया कि दर्शक भी भाव विभोर हो गए। एलईडी स्क्रीन पर पक्षियों की चहचहाहट और किले के खूबसूरत दृश्य के साथ मीरा द म्यूजिकल शो का आगाज होता है। मेड़ता के राजघराने में एक बच्ची पैदा होती है जिसका नाम मीरा रखा जाता है। मीरा का पालन पोषण उनके दादा की देखरेख में होता है जो खुद भी विष्णु के उपासक थे। उनके गुरू एक दिन आते हैं और कहते हैं कि उन्हें ऐसा भान हुआ कि कोई पवित्र आत्मा रह रही है। बस उसे देखने की लालसा में आ गए। वो मीरा को एक कृष्ण की मूर्ति भी देते हैं---यहीं से मीरा का कृष्ण के प्रति भक्ति और बढ़ जाती है। अगले ही पल नन्हीं मीरा, कृष्ण की मूर्ति लिए नृत्य करते हुए गातीं हैं कि---
घनश्याम आया रे मेरे घर श्याम आया रे
घनश्याम आया रे मेरे घर श्याम आया रे
अधर पर है प्राण उसके
हाथ में मुरली।।

बारात देख, मीरा के प्रश्न
शहनाई बजती है। कुछ लोग नृत्य कर रहे हैं। दुल्हा-दुल्हन के उपर छत्र लगा है। मीरा बड़ी मासूमियत से पूछती है कि ये क्या है। युवती बोलती है कि ये शादी हो रही है। मीरा दुल्हे के बारे में पूछती है तो मीरा से ये कहा जाता है कि वो भी जब बड़ी होंगी तो उनकी शादी कृष्ण जैसे किसी राजकुमार से होगी। बैकग्राउंड में गीत बजता है।
आज घूंघट में छिपी हूं
मिलन बेला में
आज घूंघट में छिपी हूं
मिलन बेला में
मान अब कैसे करूं मल्हार लाया रे
घनश्याम आया रे मेरे घर श्याम आया रे।।
इसके बाद मीरा की चचेरी बहन की कहानी पर्दे पर दिखाई जाती है।कैसे उनकी शादी की बात चलती हैं एवं किन परिस्थितियों में वो खुदकुशी करती है। मीरा इस घटना से बहुत ही द्रवित हो जाती है। वो परेशान हो जाती हैं।ऐसे में उनका एकमात्र सहारा गिरधारी लाल बनते हैं। बाद के दृश्य में मीरा की शादी हो जाती है। जब वो अपने ससुराल पहुंचती है तो वहां उनका धूमधाम से स्वागत होता है। उनके स्वागत में बकरे की बलि की बात कही जाती है तो मीरा विरोध दर्ज कराती हैं। कहती हैं कि प्राण लेना गलत है।क्यों कि भगवान सभी के अंदर है। इसके बदले में हम एक कटोरा खीर खा सकते हैं। वो अपनी मासा को समझाती हैं कि मनुष्य को अपने अंदर की गलत आदतों की बलि देनी चाहिए। इस पर मीरा को बताया जाता है कि बलि तो दी ही जाएगी। मीरा भी जिद पर आ जाती हैं कि यदि बलि दी गई तो वो महल में प्रवेश नहीं करेंगी। बाद में ससुर के हस्तक्षेप से बलि नहीं दी जाती हैं एवं मीरा की तारीफ होती है। यह कहानियां ऑडिटोरियम में बैठे दर्शकों समेत बच्चों को प्रभावित करती है। गीत बजता है--हरि मेरे जीवन प्राण आधार।
सूूत्रधार कहता है कि मीरा की जिंदगी कृष्ण के इर्दगिर्द घूमती है। वो घर के सभी कामकाज करने के बाद चित्तौड़ के कृष्ण मंदिर में जाकर पूजा करती है। वहां गांव वालों को कृष्ण की कहानियां सुुनाती है। मीरा गाती हैं---
नटवर नागर नंदा
भजो रे मन गोविंदा
सब देवों में देव बड़े हैं,
श्याम बिहारी नंदा, भजो रे मन गोविंदा॥
लेकिन बहुत जल्द पति तक यह बात पहुंच जाती है कि मीरा शहर में मंदिर में जाकर आम लोगों के बीच भगवान के भजन गाती है। पति पहले तो समर्थन करते हैं लेकिन मां के दबाव में झुुक जाते हैं। अंत में वो मीरा से कहते हैं कि वो कृष्ण का एक मंदिर महल के अंदर ही बना देंगे। मीरा खुशी से झूम उठती हैं। कहती हैं- क्या ये मंदिर मेरे लिए बनवाया जाएगा।
मंदिर बन जाता है। मीरा मंदिर में ही पूजा करती है। लेकिन मीरा की ननद उदा यहां भी पहुंच जाती है। कहती हैं कि राजपूत रानी का पति ही उसका भगवान होता है। मीरा, उदा से कहती हैं कि भगवान ही मेरा पति है। मीरा के भजनों से नदियों की लहरें इठलाती हैं। जंगल में पशु पक्षी भी भक्ति में झूमते हैं।
मीरा गाती हैं---
कुंजन वन छाड़ि ए माधो
कहां जाउं, उन धाम
जो मैं होती जल की मछलिया
जब प्रभू करते, हो स्नान
चरण छू लेती हो माधो
कहां जाउं उन धाम।।
इस गाने की खासियत बताते हुए मीरा का किरदार निभाने वाली श्रीविद्या वर्चस्वी कहती हैं कि इस नृत्य की खासियत योग का चमत्कारिक प्रभाव दिखाना है। आमतौर पर योग को सिर्फ आसनों के जरिए दिखाया जाता है। लेकिन इस नृत्य में हमने आसन के जरिए मीराबाई जो कहना चाहती हैं उसे दिखाया। मसलन, भगवान से मिलन, दीपक जलना, भौरों, मयूरों का नृत्य आदि को आसन के जरिए दर्शाया गया। मयूर नृत्य तो वृंदावन का खास है। जबकि नृत्य की इस कड़ी में राजस्थान की कठपुतली कला का भी प्रदर्शन किया गया।
कार्यक्रम में दिखाया गया कि मुगल बादशाह भी मीरा के भजनों पर मुग्ध हो जाता हैं एवं एक दिन खुुद मंदिर आकर उनका भजन सुनता है। मीरा भजन गाती हैं कि--
सांवरी सूरत, मोहनी मूरत
नैंना हैं विशाल
बसो मेरे नैनं में नंदलाल।।
बादशाह, मीरा को उपहार देना चाहता है लेकिन मीरा यह कहकर भगवान को समर्पित करती है कि सब भगवान की देन है। यह बात जब राजपूत राजा को पता चलती है तो वो मीरा को घर से निकल जाने का फरमान सुनाते हैं। मीरा, गुस्से में आकर नदी में खुदकुशी करने पहुंचती है लेकिन एक दिव्य ज्योति उनका मार्गदर्शन करती हैं एवं उन्हें ज्ञान देती है। जिसके बाद मीरा गुरू की तलाश में भटकती है। गुरू मिलने पर वो देश दुनिया से बेखबर हो कृष्ण की भक्ति का प्रसार करती है। हालांकि बाद में उनके पति को अपने किए पर पछतावा होता है तो वो मीरा को मनाकर वापस महल ले आते हैं। लेकिन उनकी मौत के बाद मीरा को कई तरह से परेशान किया जाता है। उन्हें जहर देकर मारने की भी कोशिश की जाती है। लेकिन मीरा सलामत बच जाती है। कार्यक्रम का आखिरी दृश्य बहुत ही मनोरम है। जिसमें मीरा द्वारका पहुंचती है एवं स्टेज पर कृष्ण की भव्य मूर्ति के दोनों तरफ कलाकार पूजा करते हैं।

कमाल के कलाकार
विद्या कहती हैं कि करीब 90 कलाकार थे, 70 स्कूली बच्चे थे। ये सभी व्यक्तिगत रुप से रिहर्सल कर रहे थे। कार्यक्रम के एक दिन पहले ही सभी मिलकर रिहर्सल कर पाए थे। लेकिन सबने शानदार अभिनय एवं नृत्य किया। मीरा के दस बहुत कम सुने भजनों के चुनने की प्रक्रिया के बारे में विद्या ने बताया कि करीब दो महीने हमनें कड़ी मेहनत की थी। हम मेवाड़ और चित्तौड़ भी गए। वहां स्थानीय लोगों से भी भजन पूछा। इतिहासकार डॉ हरि ने बहुत सहयोग किया। करीब एक महीने हमें दस भजनों के संगीत तैयार करने में भी लगे। खुद, विद्या ने पहली बार मीरा आधारित प्रस्तुति दी थी। कहती हैं, भावना और ज्ञान से कैसे मन को मुक्त किया जा सकता है यह मीरा से सीखा जा सकता है।


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