Friday, September 6, 2019

कहानी कनॉट प्लेस के बनने की

connaught place history

दिल्ली का दिल कनॉट प्लेस..जिसकी हर सांस संग दिल्ली धड़कती है। सफेद खूबसूरत भवनों की शालीनता किसी के भी दिल को छू लेती है। तभी तो सालों बाद भी इसकी धमक बरकरार है। कनॉट प्लेस का जिक्र 1911 के दिल्ली दरबार के बिना अधूरा है। किंग जॉर्ज पंचम ने 12 दिसंबर, 1911 में 80 हजार से भी ज्यादा लोगों की मौजूदगी में कोलकाता से दिल्ली को राजधानी बनाने की घोषणा की थी। 15 दिसंबर को जब आधारशिला रखी गई तो किंग ने उस पर लिखा गया कि -ये मेरी तमन्ना है कि जब नई राजधानी बनाई जाए, तो इस शहर की खूबसूरती और प्राचीन छवि को ध्यान में रखा जाए, ताकि यहां नई इमारतें इस शहर में खड़ी होने लायक लगें। कुछ इसी तरह के सपनों को आंखों में संजोये नई दिल्ली की छांव में कनॉट प्लेस का विकास हुआ।


दिल्ली को राजधानी बनाने की घोषणा के साथ ही विरोध के स्वर भी मुखर हुए। द बंगाल चैंबर्स अाफ कामर्स समेत कई संगठनों ने विरोध किया। स्टेटमेंट, पायनियर, अमृत बाजार पत्रिका में भी लेख छपे। दिल्ली के मौसम पर भी अंगुलिया उठाई गई। कहा गया कि मौसम बुखार और फोड़े-फुंसियों का सबब बनता है। दिल्ली को पंजाब का बेजान पानी और व्यवसायिक गतिविधियों वाले प्रमुख केंद्रों मसलन मुंबई, कलकता, से दूर बताकर उलाहना भी दी गई। कहा गया कि यह सिर्फ अधिकारियों की बस्ती बनकर रह जाएगा। 1912 तक राजधानी स्थानांतरण के फैसले की आलोचना होती रही लेकिन लार्ड हार्डिंग इसके महत्व को समझता था। वह जल्द से जल्द राजधानी स्थानांतरण का समर्थक था। वह चाहता था कि नई राजधानी बनाने का काम पीडब्ल्यूडी काे ना देकर एक कमेटी को दिया जाए जो संख्या में छोटी जरूर हो लेकिन अधिकारी ज्यादा हो। इस तरह टाउन वेंडिंग कमेटी परवान चढ़ी और नामों पर विचार किए जाने शुरू हुए। पहले पहले म्यूनिशिपल इंजीनियर जॉन ए ब्रॉडी और जार्ज स्वींटन का नाम सुझाया गया। इन्होंने भारत में कई साल गुजारे थे एवं इन्हें यहां रहने का अनुभव भी बहुत ज्यादा था। खैर, टाउन प्लानिंग कमेटी का गठन हरबर्ट बेकर, लुटियंस के नेतृत्व में हुआ। 15 अप्रैल 1912 को कमेटी के सदस्य दिल्ली पहुंचे। इन्हें सिविल लाइंस स्थित मेडन होटल में ठहराया गया। यहां वो करीब पांच सप्ताह तक रहे। गर्मी की भीषण गर्मी झेलने के बाद 20 मई को वो शिमला रवाना हुए। जहां हिल स्टेशन के खूबसूरत मौसम के बीच फाइनल राउंड की बैठक सम्पन्न हुई। 13 जून को कमेटी ने राजधानी बनाने के लिए उचित स्थान के चुनाव को लेकर फाइनल रिपोर्ट सौंपी।
राजधानी बनने की निरंतर प्रकि्रया के दौरान ही कमर्शियल शापिंग सेंटर के रूप में कनॉट प्लेस विकसित हुआ। हालांकि जब कलकत्ता से दिल्ली राजधानी स्थानांतरित की गई तभी शापिंग सेंटर बनाने की बात उठी थी। कलकत्ता की यूरोपियन कमर्शियल कम्यूनिटी के सदस्यों की तरफ से एक मांग की गई, जिसमें कहा गया कि एक ही सड़क पर मॉल्स, डिस्ट्रिक सेंटर बनाया जाए ताकि शापिंग आसान हो सके। कमेटी ने बाद में प्राइवेट फर्मों को कहा कि उन्हें उचित रेट पर यहां शॉप अलॉट किए जाएंगे। कमेटी ने 1913 में शापिंग के लिए शहर के नार्थ की तरफ जगह चिन्हित की थी। एक सर्किल के रूप में इसका ले आउट बनाया गया जबकि इसके सेंट्रल पोर्शन में रेलवे टर्मिनल बनाने का प्रस्ताव रखा गया। तय हुआ कि इस रेलवे स्टेशन के सामने प्रशासनिक अधिकारी, नगर निगम के अधिकारियों के अलावा पोस्ट आफिस, दुकानें व होटल बनाए जाएंगे। सन 1914 में अत्यधिक खर्चीली बता इस योजना को नामंजूर कर दिया गया। हालांकि स्टेशन बनाने के आइडिया शहर से और उत्तर की तरफ बनाने को मंजूरी दी गई। भवनों को प्राइवेट इन्वेस्टर्स से बनवाकर ब्लॉक को बेचा गया। कनॉट प्लेस बसाने की योजना वास्तुविद एच निकोलस की थी, लेकिन अंजाम दिया वास्तुविद राबर्ट टॉर रसल ने। कनॉट प्लेस की बनावट घोड़े की नाल की बनावट से मेल खाती है और इसके ढांचे की प्रेरणा ब्रिटेन स्थित रॉयल क्रीसेंट से ली गई थी। यह इलाका माधोगंज गांव के नाम से जाना जाता था। जहां चारों ओर जंगल था। माधोगंज गांव जयपुर के महाराजा जयसिंह की रियासत का हिस्सा था। उन्होंने यह जगह अंग्रेजो को भेंट की। बाकी कुछ जगह दो रुपये प्रति वर्ग मीटर की दर से स्थानीय लोगों से खरीदी गई। ड्यूक ऑफ कनॉट के नाम पर अंग्रेज बहादुरों की गोरी मेमों के सैर-सपाटे के लिए बसाए गए इस बाज़ार की शक्ल बिल्कुल अलग थी। इनर सर्किल को कनॉट प्लेस जबकि आउटर सर्किल को कनॉट सर्किल नाम दिया गया था। जबकि इनके बीच आेपन एरिया को बहुत ही अच्छे तरीके से व्यवस्थित किया गया था एवं यहां प्रत्येक सप्ताह शनिवार को बैंड म्यूजिक का आयेाजन होता था। संगीत का यह आयोजन अक्टूबर के मध्य से अप्रैल के मध्य तक होता था। जब राजधानी छह महीने के लिए शिमला चली जाती थी तो कनॉट प्लेस भी वीरान सा हो जाता था। अपनी किताब कनॉट प्लेस एंड द मेकिंग आफ न्यू दिल्ली में स्वप्ना लिडले लिखती हैं कि कनॉट प्लेस को बनाया ही अमीरों की सहुलियत के लिए था। इसे बनाने के दौरान ध्यान रखा गया था कि यहां मोटर व्हीकल आसानी से मूव कर सकें। जबकि जिन्हें पुरानी दिल्ली घूमनेजाना होता था वो तांगे या बस से जाते थे। इलेक्ट्रानिक बसें यहां 1934 में चलनी शुरू हुई। जो सिविल लाइंस और पुरानी दिल्ली को नई दिल्ली से जोड़ती थी। कनॉट प्लेस के दो ब्लॉक में 1927-28 एवं 1929-30 में लोग शिफ्ट हुए। आउटर रिंग कनाट सर्किल पर 10 ब्लॉक बने थे। जिसमें बड़े संस्थान के आफिस थे। इन्हीं में स्टेटमेंट एवं बुमराह सेल्स आयल के आफिस थे। यहीं सिंधिया हाउस भी हुआ करता था।
यहां थियेटर बनने के पीछे की कहानी भी काफी दिलचस्प है। शोभा सिंह ने सीपी में 3.44 एकड़ जमीनी पर थियेटर बनाने की योजना बनाई। करीब छह लाख रुपये में थियेटर बनाने की योजना को 1930 में मंजूरी भी मिल गई। इसमें सिनेमा हाल के अलावा अन्य सुविधाएं भी थी। यह 1932 में बनकर तैयार हुआ। इस तरह रीगल सिनेमा दुनिया केसामने आया। इसका मैनेजमेंट खुद शोभा दीपक सिंह देखते। इसका उद्देश्य धनाढय लोगों को आकर्षित करना था। यहां बार भीहोता था। इसे देखते ही देखते अन्य थियेटर भी अस्तित्व में आए। जैसे 1933 में प्लॉजा, 1940 में ओडियन, 1941 में रिवोली बना। हालांकि इसमें सिर्फ अंग्रेजी फिल्में ही प्रदर्शित की जाती थी। इंडियन फिल्म के लिए भी एक थियेटर खोला गया जिसका नाम रायसीना थियेटर रखा गया। इरविन रोड पर सेठ ब्रदर्स ने सन 1938 में यह थियेटर बनवाया था। यहां एक कहानी और दिलचस्प है कि इन स्थायी थियेटर से पहले एक अस्थाई थियेटर भी था। 1929-30 की ब्रिटिश डायरेक्टरी में प्रिंस आफ वॉल्स सिनेमा का जिक्र मिलता है। जो तालकटोरा गार्डन में बनाया गया था।
बकौल स्वप्ना कनॉट प्लेस से बाद के वर्षों में कमर्शियल एक्टीविटी आगे बढ़ती चली गई। वैसे 1920 में ही गोल मार्केट बन गया था। नई दिल्ली में बना यह पहला मार्केट था। 1928-29 में एक प्राइवेट फर्म ने बेयर्ड रोड और लेडी हार्डिंग रोड पर दुकानों की एक श्रृंखला खोली। उसने इसका नाम पार्लियामेंट स्ट्रीटरखा। दिलचस्प है कि कई सालों तक इसे पार्लियामेंट स्ट्रीट के नाम से ही जाना जाता था। इसी रोड पर 1 जनवरी 1926 को इम्पीरियल बैंक आफ इंडिया भी खुला। रॉयटर इसी बिल्डिंग में 1928 में शिफ्ट हुआ था।
दिल्ली के पहले होटल के खुलने की गाथा भी यहीं से जुड़ी है। दरअसल, नारायण सिंह ने क्वीन वे पर 8 एकड़ जमीन पर अपने बेटे रंजीत सिंह के साथ 1936 में दिल्ली के पहले एवं सबसे बड़े होटल इम्पीरियल का शुभारंभ किया। इसका डिजाइन आर्ट डे को कि स्टाइल में आर्किटेक्चर सीजी और एफबी ब्लोमफील्ड ने बनाया था।
1940 तक आते आते यह दिल्ली का सबसे पसंदीदा फैशनेबल शापिंग सेंटर बन गया था। यहां कई ब्रांड पुरानी दिल्ली समेत दिल्ली के बाहर से भी आए थे। जैसे लग्जरी घड़ी बनाने वाली कुक एंड केलवे कंपनी ने कलकत्ता से अपनी शाप यहां खोली। चांदनी चौक-कश्मीरी गेट की प्रसिद्ध इंडियन आर्ट पैलेस भी 1936 में यहां खुला। रॉयल हेयर ड्रेसिंग जो लंदन में बाल काटना सीखने वालों को ही नौकरी पर रखते थे कि दुकान खुली। कनॉट प्लेस में ब्रांडेड शोरुम खुले दूसरी तरफ गोल मार्केट में ग्रोसरी शॉप, फिश शॉप खुली। कारण, सीपी में अमीर लोग ही शापिंग करते थे जबकि गोलमार्केट में उनके यहां के घरेलू सहायक रोजमर्रा की शािपंग करने जाते थे।
फूड बिजनेस की सीपी में शुरूआत भीकाफी दिलचस्प थी। डविको लिमिटेड ने यहां इसी दरम्यान दुकान खोली थी। वो बड़े ही गर्व के साथ दुकानपर कहते थे कि उन्हें वायसराय ने अनुमित दी है। यह शॉप पहले कश्मीरी गेट में होती थी। बाद में सीपी में लंच, डिनर के लिए रेस्त्रां खोला। इसका प्रमुख आकर्षण आर्केस्ट्रा और ट्री डांस था जो हर बृहस्पतिवार और शनिवार को होता था।
यहां किताबों की दुकानें भी खूब खुली।जैसे इ डी गलगोटिया एंड संस, न्यूज एजेंट, बुकसेलर्स, अमृत बुक कंपनी और इंगलिश बुक कंपनी की दुकानें खुली। रामचंद्र जैन जिनकी पुरानी दिल्ली में प्रिंटिग प्रेस की दुकान थी, उन्होंने 1936 में यहां धूमिमल के नाम से पहली आर्ट गैलरी खोली। द्वितीय विश्व युद्ध के समय सीपी में भीड़ खूब बढ़ गई। कारण, यह केंद्र बिंदु होता था।
पहला सक्सेसफुलब्रांड
किशोरी लाल लांबा सन 1940 में लाहौर से दिल्ली आए थे। वो हाथ से आइसक्रीम बनाकर कनॉट प्लेस में बेचते थे। नाम उन्होंने क्वालिटी दिया था। अमेरिकी सैनिकों को यह आइसक्रीम खूब पसंद आती थी। एक दिन अमेरिकी वेटेरेनरी सर्जन ने उन्हें इसके व्यवसाय का आइडिया दिया और इस तरह दिल्ली ही नहीं भारत का पहला सबसे सक्सेसफुल ब्रांड क्वालिटी अस्तित्व में आया। समय के साथ कनॉट प्लेस की यात्रा अब भी जारी है। कनॉट प्लेस की यह खूबसूरती ही है जो सालों बाद भी लोगों में इसका क्रेज बरकरार है। दिल्ली में आजादी के बाद से कई बाजार खुल गई लेकिन आज भी दिल कनॉट प्लेस में ही धड़कता है।



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