Saturday, August 17, 2019

कबीर के दाेहे पर रंजना गौहर का नृत्य

ranjana gauhar dance on kabir couplets

इंडिया हैबिटेट सेंटर में आयोजित दो दिवसीय शास्त्रीय नृत्य-संगीत का यह कार्यक्रम कई मायनों में बहुत ही खास था। एक से बढ़कर एक कलाकारों की प्रस्तुति ने दर्शकों का दिल जीत लिया। मंगलवार को हुए उद्घाटन समारोह की प्रस्तुति कुछ ऐसी थी कि दर्शक सुरधारा में डूब ही गए। ऑडिटोरियम दर्शकों से खचाखच भरा था। दिल्ली ही नहीं एनसीआर के कोने कोने से लोग आए थे। ऐसे भी अभिभावक थे जो अपने बच्चों को देशभक्ति की उस अनुपम सुरधारा से साक्षात्कार करवाना चाहते थे जो इस कार्यक्रम में प्रवाहित होने वाली थी। शुरुआत कला क्षेत्र के दिग्गजों को सम्मानित करने से हुई। इस सुरमयी शाम का अगला पड़ाव कबीर की रचनाअों पर आधारित था। जिसपर पदमश्री गुरू रंजना गौहर की प्रस्तुति यादगार थी। जबकि बुधवार रात आलोक कानूनगो, डॉ अन्वेषा महंता, कविता ठाकुर,जया प्रभा मेनन और रानी खानम की शानदार प्रस्तुतियों ने दर्शकों को भाव विभोर कर दिया।


उत्सव सम्मान
गुरूवार रात कला एवं संगीत क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान देने वाले चार प्रसिद्ध शख्सियतों पदमश्री बंकिम सेठी, गुरू धनेश्वर सवाइन, आर्ट क्रिटिक मंजरी सिन्हा एवं प्र्रसिद्ध बांसुरी वादक चेतन जोशी को सम्मानित किया गया। बंकिम सेठी की जिंदगी सुर लय और ताल की तरह ही विविधताओं भरी है। जन्म ओडिशा में हुआ था। चूंकि पिता अपने समय के प्रसिद्ध संगीतकार थे लिहाजा इनकी संगीत शिक्षा सात साल की उम्र से ही शुरू हो गई। इन्होंने ना केवल ओेडिशा बल्कि दिल्ली में ओेडिशा नृत्य को जनसामान्य के बीच ले गए। जबकि गुरू धनेश्वर सवाइन मरदल को लोकप्रिय बनाए। इन्होंने अमेरिका, जापान, यूके, डेनमार्क, स्वीडन, दक्षिण कोरिया, इजराइल, इजिप्ट, ग्रीस आदि देशों में प्रस्तुति के जरिए शास्त्रीय नृत्य संगीत को समृद्ध कर चुके हैं। चेतन जोशी बांसुरी की धुन को भारत के कोने कोने तक पहुंचा चुके हैं। इसके अलावा जापान और दक्षिण कोरिया में भी प्रस्तुति दे चुके हैं। आर्ट स्कालर मंजरी सिन्हा गायन, तबला, सितार और कथक में दक्ष है। पदमश्री रंजना गौहर कहती हैं कि उत्सव : रंजना अकेडमी ऑफ ओडिशी डांस प्रति वर्ष नृत्य संगीत कार्यक्रमों का आयोजन करती है। सारे जहां से अच्छी उसी कड़ी का पड़ाव है। जिसमें सीनियर आर्टिस्ट की प्रस्तुति देशभक्ति का जज्बा जगाती है एवं शास्त्रीय नृत्य संगीत से दर्शकों को जोड़ती है।

खुद में कबीर, कबीर में हम
कबीर की रचनाओं के जरिए निगुर्ण भक्ति का भाव दर्शकों के सामने रखा गया। यह नृत्य ड्रामा प्र्रस्तुति दर्शकों को इस कदर पसंद आयी कि तालियां बजाकर अभिवादन किया। पदमश्री रंजना गौहर कहती हैं कि जब मैं कबीर पर प्रस्तुति के बारे में विचार कर रही थी सबसे ज्यादा चुनौतीपूर्ण इसका सब्जेक्ट चयन था, जो ना सिर्फ दर्शकों को पसंद आए बल्कि जिस पर नृत्य किया जा सके। ऐसा इसलिए भी जरुरी था क्यों कि कबीर का व्यक्तित्व बहुत ही गहराई भरे आध्यात्मिक, अमूर्त और दार्शनिक थे। कोई इसे नृत्य के लिए तो विशेष पसंद नहीं ही कह सकता है। लेकिन मैंने कबीर की भावनाओं को अपनी कला के जरिए दर्शकों तक पहुंचाने की ठानी। जब मैंने उनकी रचनाओं के बोल पढ़ने शुरू किए तो उनमें मुझे तुकबंदी और संगीत मिला। एक ओडिशी नृत्यांगना के नाते मुझे महसूस हुआ कि कबीर की रचनाओं में जितनी बेबाकी से बातों को कहा गया है, उसके लिए मुझे और क्रिएटीव मूवमेंट के साथ प्रस्तुति देनी होगी। यह भी पर्याप्त नहीं था कि मैं केवल उनके दोहों को पढ़ूं क्यों कि वर्तमान दौर में युवा पीढ़ी कबीर को ज्यादा नहीं जानती है। यह उनकी जिंदगी और परिस्थितियां थी, जिन्होंने कबीर को कबीर बनाया। इसलिए यह जरुरी था कि प्रस्तुति में कबीर केंद्र से ना हटे। खुद में कबीर और कबीर में हम के जरिए कबीर के व्यक्तित्व के साथ साथ उनके उस बेमिसाल काम को दर्शकों को बताना चाहते थे, जो सदियों बाद भी प्रासंगिक है। उनके दोहा सदियों से लोग पढ़ते-कहते एवं उसका अर्थ समझने की चेष्टा कर रहे हैं। बकौल रंजना गौहर यह प्रस्तुति विभिन्न सतहों में विभाजित थी। पहले लेयर में कबीर के शरीर के संदभ्5 में कहे दोहों को नृत्य के जरिए प्रस्तुत किया गया। जबकि दूसरे चरण में कबीर के उन दोहों पर आधारित थे। जबकि आखिरी लेयर उस सूत्रधार की थी जो दर्शकों से सीधा संवाद करता है। कबीर एवं उनके सोच के बारे में दर्शको को बताता है। इसमें सूत्रधार के रूप में गुरु रंजना गौहर व कबीर के रूप में केविन बच्चन ने दर्शकों को भावुुक किया। यह प्रस्तुति करीब 70 मिनट की थी। कबीर के जन्म का प्रसंग बहुत ही मार्मिक था। इस संगीतमय प्रस्तुति के बाद दर्शक अपनी सीट पर खड़े होकर तालियों से अभिवादन किए।

वंदे मातरम

दूसरे दिन की पहली प्रस्तुति अलोका कानूनगो की वंदे मातरम थी। बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा लिखित यह गीत कार्यक्रम के मूल संदेश की प्रतिमूर्ति थी। अलोका की शानदार प्रस्तुति ने दर्शकों में देशभक्ति की भावना का संचार किया। कई ऐसे मूवमेंट भी थे जिन्हें दर्शकों की भरपूर तालियां मिली। संगीत हिमांशु साइवान और धनेश्वर साइवान का था। जबकि श्रीपर्णा बोस, निवेदिता दत्ता, पाउलोमी चक्रवर्ती और सुवा्र मैती ने अपने नृत्य से दर्शकों का मन मोहा। अलोका की दूसरी प्रस्तुति जगत माता भी लाजवाब थी। दुनिया का प्रादुर्भाव, संरक्षण और विघटन सिर्फ जगतमाता के जरिए ही संभव है। इन्हें आदिशक्ति भी कहा जाता है। काली, तारा, भुुवनेश्वरी,त्रिपुरा, भैरवी, मातंगी, कमला आदि महादेवियों के रूप में पूजा की जाती है। अलोका कानूनगो ने तीन महादेवियों काली, छिन्नमस्ता और बगलामुखी पर आधारित प्रस्तुति दी। इसकी शुरुआत तीनों देवियों की स्तुति करते श्लोक से हुई। अलोका की अाखिरी प्रस्तुति पल्लवी थी। पल्लवी यानी विस्तार। यह संगी और नृत्य दोनों पर बराबर लागू होता है। यह विशुुद्ध नृत्य प्रस्तुति थी। इसके बाद अन्वेषा महंत ने वंदना और रामदानी एवं प्रकृति पुरुषा की सत्त्रिया प्रस्तुति दी। जबकि प्रकृति पुरुष नृत्य प्रस्तुुति कृष्ण, राधा एवं गोपियों पर केंद्रित थी। इसके बहाने आत्मा-परमात्मा के मिलन को दर्शकों के सामने प्रस्तुत किया गया। कविता ठाकुर ने गंगा अवतरण की कथा को नृत्य के जरिए प्रस्तुत किया। वहीं जयाप्रभा ने मोहिनीअट्टम प्रस्तुति दी। जबकि समारोह की अाखिरी प्रस्तुत रानी खानम की थी। जिन्होंने यमुना आरती को कथक के जरिए जीवंत बना दिया। यमुना आरती यमुनाष्टकम पर आधारित थी। यमुना भक्तों की सभी इच्छाएं पूरी करने में सक्षम है। यमुनोत्री से निकलकर वो हजारों किलोमीटर का सफर तय कर प्रयागराज में संगम का हिस्सा बनती है। उनकी यहां तक की यात्रा के दौरान फ्लो में बदलाव होते रहते हैं। नदी प्रदूषण से जूझ रही है। कई जगह प्रदूषण के चलते धारा प्रवाह भी मुश्किल होता है। लेकिन नदी की धारा रुकती नहीं है, किसी अन्य तरफ से अपना रास्ता बना लेती है। नदी का आखिरी पड़ाव डेल्टा होता है। ठीक इसी तरह इंसानी जिंदगी में भी कठिनाइयां आती है। कुछ बहुत मुश्किल होती हैं। लेकिन जिंदगी का सफर चलता रहता है। इन सभी भावों को कथक के जरिए बड़ी संजीदगी से प्रस्तुत किया गया।

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