Saturday, August 10, 2019

दिल्ली की एक शाम खुसरो-कबीर के नाम

दिल्ली में ऐसे बहुत कम कार्यक्रम होते हैं जिनमें दर्शक समाप्ति तक कुर्सियों से ना केवल चिपके रहे बल्कि तालियों का जोश भी ठंडा ना पड़े।  में ऐसे ही एक कार्यक्रम का गवाह बना। जो दिल को सुुकून देने वाला था। हजरत अमीर खुसरो अौर कबीर में भले ही दो सदियों का अंतर हो लेकिन दिल्ली की एक सुहानी शाम में दोनों एक छत के नीचे थे। दोनों ही की जनसाधारण से जुड़ी रचनाएं उन्हें आज भी प्रासंगिक बनाती है। शायद यही वजह है कि कमानी ऑडिटोरियम में खुसरो-कबीर पर आयोजित समारोह में संगीतप्रेमी उमड़ पड़े। ऑडिटोरियम खचाखच भरा था। ऐसे माहौल में जब खुसरो और कबीर की रचनाओं को एक से बढ़कर एक बेहतरीन फनकारों ने प्रस्तुत किया तो शाम यादगार बनती चली गई। दर्शक हर रचना के साथ भावों के सागर में डूबते जा रहे थे। युवा फनकारों की कबीर और खुसरो प्रस्तुति दर्शकों को पसंद आयी। तीन भागों में बंटे कार्यक्रम की शुरूआत नई पीढ़ी के कलाकारों की प्रस्तुति से हुई। जबकि दूसरे सत्र में कबीरपंथी प्र्रस्तुति ने इसे खास बनाया। जबकि कार्यक्रम का समापन चिश्ती ब्रदर्स की सूफी कव्वाली से हुआ।
शुरूआत अर्चिता भट्टाचार्या द्वारा अमीर खुसरो का कलाम गाने से हुआ। अर्चिता ने
बन के पंछी भए बावरे ऐसी बीन बजाई संवारे
तार तार की तान निराली झूम रही सब वन की डारी।। गाया तो दर्शक भी झूमने लगे। संगीत का जो यह सुरीला सफर शुरू हुआ वह एक के बाद एक पड़ाव से गंतव्य तक गया। अर्चिता द्वारा अलाप लिए जाने के दौरान दर्शक इस कदर भावुक हो जाते कि अपने सीट पर खड़े होकर तालियां बजाते। सफर जब--हे री सखी
मोरे पिया घर आए
मैं तो खड़ी थी अास लगाए
मेंहदी कजरा मांग सजाए
देखि सुुरतिया अपने पिया की
हार गई, तन मन हो।। से होकर गुजरा तो दर्शक भी भाव विह्वल हो गए। अर्चिता ने--चदरिया झीनी रे झीनी भी गाया। बकौल अर्चिता, क्लासिकल, गजल गाती हैं। लेकिन जब कबीर और खुसरो को गाती है तो एक अजब ही अनुभूूति होती है। दिल को गाना गाते समय सुकून मिलता है जिसे शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता है।
खुसरो-कबीर कार्यक्रम में अगली प्रस्तुति गायत्री अशोकन की थी। केरल में जन्मी और प्लेबैक सिंगिग को बतौर करियर चुनने वाली गायत्री के लिए यह प्रस्तुति बहुत ही खास थी। कहती हैं, दिल्ली की ऑडिएंश् के सामने कबीर और खुसरो की रचनाओं को गाना एक सुखद अनुभव है। कई मलयालम फिल्मों गाना गा चुकी गायत्री की पहली प्रस्तुति ही दर्शकों के दिल को छू गई। गायत्री ने---च्बहुत कठिन है डगर पनघट की
कैसे भर लाऊं, मथुरा से मटकीज् गाया। खुसरो की इस रचना को गायत्री ने जब अपने अंदाज में गाया तो दर्शक दीवाने हो गए। इन्होंने जब--कबीर की रचना अपना कोई नहीं सुनाया तो ऐसा लगा जिंदगी की सच्चाई आंखों के सामने आ गई। मायाजाल में उलझे इंसान को सही राह दिखाती यह प्रस्तुति शानदार थी। गायत्री ने मोहे अपने रंग में रंग दे रंगीले, साहिब मोरा महबूब इलाही।। भी बड़ी तन्मयता से गाया।
संगीत का यह सफर अब तक अपनी लय पकड़ चुका था। कार्यक्रम की तीसरी प्रस्तुति दिल्ली की विद्य्रा शाह की थी। सिंगर, लेखक विद्या शाह की बुलंद आवाज में जब दर्शकों ने मन लागा मेरा यार फकीरी में, सुना तो ऑडिटोरियम तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा। हद और अनहद के बीच का फर्क भी विद्या शाह ने बड़ी बखूबी गाने के जरिए दर्शकों को समझाया।
कबीर भी मुरली की धून सुुनकर रह नहीं पाते थे। उन्हें भी धुुन अपनी तरफ खींचती थी। इसी भाव विद्या ने
च्हमसे रहा ना जाए, मुरलिया की धुन सुन केज् के जरिए दर्शकों के समक्ष प्रस्तुत किया।
https://en.wikipedia.org/wiki/Vidya_Shah


कबीर पंथी
कार्यक्रम अब अपने पूरे शबाब पर था। दर्शक गानों के जरिए कबीर और खुसरो की सोच को जीने लगे थे। महसूस कर रहे थे। कबीरपंथी सेशन में प्रसिद्ध लोकगीत गायक प्रहलाद सिंह टिपनिया को आना था लेकिन वो किन्हीं कारणों से आ नहीं पाए। जब यह घोषणा दर्शकों के सामने की गई तो कई लोग मायूस हो गए। दरअसल, प्रहलाद सिंह को सुनने बड़ी संख्या में दर्शक दूर दराज इलाके से आए थे। लेकिन प्रहलाद सिंह की कमी उनके बेटे और भाई ने नहीं होने दी। इन्होंने इतनी खूबसूरती से कबीर के संदेशों को गाया कि दर्शक भक्ति रस में सराबोर हो गए। समूह ने जरा हल्के गाड़ी हांको, मेरे राम गाड़ी वाले गाया तो ऐसा लगा कि जिंदगी की गाड़ी को राम का सहारा मिल गया है। कार्यक्रम के आखिर में चिश्ती ब्रदर्स ने कव्वाली गाया। जिसपर दर्शक जी भर के झूमे।

No comments:

Post a Comment

महिला संघर्षों की कहानी सुनाती प्रदर्शनी

Artworks telling the story of women's struggle in India अक्टूबर माह में  नई दिल्ली में मूर्तियों व पेंटिंग्स की एक ऐसी प्रदर्शनी लगन...