Saturday, August 10, 2019

दिल्ली में 15 अगस्त 1947 को ऐेसा था माहौल

आजादी की खुशबू फिजाओं में फैली थी। ये सुगंध हर किसी को दिल्ली की गलियों में खींचकर ले आ रही थी। चौक चौराहों पर देशभक्ति के तराने बज रहे थे। लाउडस्पीकर का शोर दूर से ही रोमांचित करता था। बड़े-बुजुर्गों की टोली बच्चों को कंधों पर बैठाए लाल किले की तरफ जा रही थी। दुकानों पर सामानों की खरीद पर आफरों की बरसात थी। खुली हवा में सांस लेने की खुशी दिल्लीवालों के चेहरे पर साफ झलक रही थी लेकिन लाल आंखे ये बताने के लिए काफी थी कि रात जागते हुए गुजरी है। आजादी, विभाजन का दंश देकर गई थी। अपनों को डरे सहमे हालत में सरहद पार जाते देखना दिल्लीवालों के लिए कलेजा कटाने वाला था। हर कोई गम और खौफ में जी रहा था लेकिन आजादी के बाद पहले स्वतंत्रता दिवस के स्वागत में भी दिल्ली ने कोई कोर कसर नहीं छोड़ी थी। लाल किला गुलजार था। पूरी दिल्ली मानों दुुल्हन की तरह सजाई गई थी। यह पूरा माहौल आज भी किताबों, इतिहासकारों के जेहन में कैद है। 

https://en.wikipedia.org/wiki/Independence_Day_(India)

इतिहासकार सोहेल हाशमी कहते हैं कि सन 1947 का दिल्ली बहुत ही अलग शहर था। शाहजहानाबाद, जिसे देलही या दिल्ली के नाम से जाना जाता था। एक ऊंची दीवार के भीतर बसा हुआ था। जो उत्तर में सिविल लाइन्स और माल रोड, किंग्सवे कैंप तक फैली हुई थी। जहां 1911 के दरबार को किंग जॉर्ज पंचम और रानी मैरी को भारत के सम्राट और महारानी के रूप में सेलिब्रेट करने के लिए आयोजन किया गय था। दक्षिण में और शाहजहां के शहर से अलग नई दिल्ली थी, पश्चिम में और शहर की दीवार के बाहर पहाड़गंज, करोल बाग और सदर बाज़ार और पूर्व में यमुना नदी थी जिसके पार शाहदरा की पुरानी बस्ती थी। जमीन से निकली चट्टानें, प्राचीन गांव कृषि भूमि और पुराने शहरों के खंडहर मसलन तुगलकाबाद, पुराना किला और सिरी आदि के खंडहर थे। 3 जून 1947 को विभाजन की घोषणा हुई। ज्ञानेंद्र पांडेय अपनी किताब रिमेंबरिंग पार्टिशन में लिखते हैं कि विभाजन की घोषणा के बाद से ही दिल्ली में हड़कंप मच गया। करीब 3 लाख 30 हजार मुस्लिम दिल्ली से पाकिस्तान गए। इस दौरान दिल्ली की आबादी में 3 लाख 50 हजार कमी दर्ज की गई। सोहेल हाशमी कहते हैं कि मौलाना अबुल कलाम आजाद एक पब्लिक रैली को संबोधित कर रहे थे। इसमें मुसलमानों की तादात ज्यादा थी। वो लोगों से कह रहे थे कि यह उनकी मातृभूमि है। इसे छोड़कर मत जाएं। लेकिन हकीकत यह थी कि जब वो ऐसा कह रहे थे तो सुनने वालों में से सैकड़ों ने पाकिस्तान जाने का मन बना लिया था। खैर इसी समय के दरम्यान करीब साढ़े चार लाख से ज्यादा हिंदू, सिख शरणार्थी पंजाब, सिंध और नार्थ इस्ट फ्रंटियर से दिल्ली आए। इससे िदिल्ली की आबादी बहुत बढ़ गई। जब दिल्ली में बड़ी संख्या में शरणार्थी आए तो यहां रहने, खाने से लेकर नौकरी समेत अन्य समस्याएं भी सिर उठाने लगी। लेकिन सबसे पहली जो समस्या सामने आयी वो थी रहने की। पुरानी दिल्ली के समुदाय विशेष कालोनियों में लोग नहीं चाहते थे कि उनके यहां शरणार्थी रुके। मुस्लिम बस्तियों में रहने वाले भी शरणार्थियों से डरे सहमे थे। यही वजह थी कि वरिष्ठ नागरिकों का एक संगठन जाकर महात्मा गांधी से मिला एवं उनसे पंडित जवाहर लाल नेहरू के जरिए गृह मंत्री को कहलवाया कि वो पुरानी दिल्ली के नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करे। इसलिए, शरणार्थियों को नए इलाकों में बसाया गया। 
शरणार्थी सभी उपलब्ध स्थानों पर बसाए गए। पुरानी इमारतों में, सुनसान मस्जिदों में, मध्ययुगीन ढांचों में, खुले मैदानों में और शाहजहांनाबाद के चारों ओर दीवार की मेहराबों, छज्जे के नीचे, पुरानी इमारतें थीं। बहुत जल्द, मेहर चंद खन्ना को पुनर्वास के लिए मंत्री नियुक्त किया गया और सभी प्रकार की योजनाओं को जल्द से जल्द पूरा करने, स्कूलों को शुरू करने, नौकरी खोजने, मुआवजे का दावा करने और लापता लोगों को खोजने का जिम्मा सौंपा गया। विभाजन की इसी त्रासदी के दौरान वरिष्ठ नेता विजय कुमार मलहोत्रा का परिवार भी दिल्ली आया था। कहते हैं, हमारा परिवार जब दिल्ली आया तो रहने के लिए जगह नहीं थी। यहां वहां भटकना पड़ा। पंचकुइयां रोड पर एक खाली मकान पड़ा था, जिसमें हमने रहना शुरू किया। बाद में निजामुद्दीन में 6हजार रुपये में घर में शिफ्ट हुए। 

गत्ता कालोनी बनाई गई
इतिहासकार बताते हैं कि कैंप, गुरुद्वारा, मंदिर, स्कूल ही नहीं सेना के कैंप तक में भी शरणार्थी बसाए गए। बावजूद इसके शरणार्थियों के लिए जगह की कमी थी। इसलिए यहां गत्ते की मदद से अस्थाई आवास बनाए गए। ये आवास पूरी दिल्ली भर में बनाए गए थे। लेकिन सबसे ज्यादा गत्ते के मकान लाल किले के आसपास बनाए गए थे। इन्हें लोग गत्ता कालोनी कहकर  पुकारते थे। इसे पहचानने के लिए सीरियल नंबर दिया गया था। डीडीए के पूर्व कमिश्नर एके जैन बताते हैं कि हालात थोड़े सुधरे तो शरणार्थियों को पक्का आश्रय देने पर काम शुुरू हुआ। स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के नाम पर दिल्ली भर में 36 स्थायी पुर्नवास कालोनियां बसाई गई। जिनमें लाजपत नगर, राजेंद्र नगर, पटेल नगर, तिलक नगर, मालवीय नगर आदि को खेतों में, रिज एरिया में बसाया गया। हर आवंटी को जिसका घर 60 से 80 स्कवायर यार्ड प्लॉट पर बना था। दस सालों तक 12.30 रुपये बतौर किराया दिए। स्थायी आवास मिले तो कारोबार ने भी रफ्तार पकड़ी। पाकिस्तान, पंजाब से आने वाले शरणार्थियों ने दिल्ली में कारोबार शुरू किया। 
एमडीएच के प्रबंध निदेशक महाशय धर्मपाल गुलाटी भी इसी दौर में दिल्ली आए थे। कहते हैं कि हिंदुस्तान के बंटवारे के बाद हमारा पूरा परिवार सियालकोट से दिल्ली महज 1500 रुपये लेकर आया था। यहां परिवार को पालने के लिए तुरंत कार्य करने की जरूरत थी। सबसे पहले एक तांगा खरीदा और नई दिल्ली से कुतब रोड व पहाड़गंज तक चलाना शुरू किया। काफी देर तक साहब..दो आने सवारी, दो आने सवारी, चिल्लाता रहता था, लेकिन सवारी नहीं मिलती थी। मैं हताश हो गया था। इसके बाद मैंने सोचा कि इससे जिंदगी नहीं चलने वाली है। मैंने तांगा बेच दिया और अजमल खान रोड पर महाशय दी हट्टी के नाम से मसाले की दुकान खोल ली। इसके बाद सफर की शुरुआत हुई और आज पूरे देश में एमडीएच की 22 फैक्ट्रियां हैं। आजादी के पहले पड़ोसी राज्यों के विभिन्न शहरों से कारोबारी आते एवं थोक में सामान खरीदने के बाद उंट पर लादकर गंतव्य तक जाते। लेकिन शरणार्थियों  के आने के बाद हालात और बेहतर हुए। सन 1964 का इंडस्ट्रियल सर्वे बताता है कि 1945 से 1951 के बीच रजिस्टर्ड फैक्ट्रियों की संख्या 227 से बढ़कर 431 हो र्ग। 1945 के पहले दिल्ली में तीन साइकिल मैन्यूफैक्चरिंग इंडस्ट्री भी थी। जो 1951 में बढ़कर 7 हो गई। 

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