Friday, October 11, 2019

महिला संघर्षों की कहानी सुनाती प्रदर्शनी

Artworks telling the story of women's struggle in India

अक्टूबर माह में नई दिल्ली में मूर्तियों व पेंटिंग्स की एक ऐसी प्रदर्शनी लगने वाली है जो पुरुष वर्चस्व वाले समाज में महिला संघर्ष की कहानी सुनाएगी। 20 अक्टूबर 2019 से विजुअल आर्ट गैलरी, इंडिया हैबिटैट सेंटर में 73 वर्षीय आर्टिस्ट किरण दीक्षित थापर की सोलो एक्जीबिशन लॉ फेमे फैटेल्स लगेगी जो बुद्धिमान महिलाओं का जश्न मनाती हैं। यह उन महिलाओं को समर्पित है जिन्होंने इस पितृसत्तात्मक समाज में अपने लिए एक जगह बनाई है।
कला व शिल्प के पैट्रन होने के नाते किरण दीक्षित थापर की मूर्तियां शांतिनिकेतन में उनके जीवन से प्रेरित हैं, जहां वे अब रहती हैं। इस प्रदर्शनी में 52 मूर्तियां और करीब 25-30 पेंटिंग्स रखी जाएंगी। सामान्य को असाधारण बनाने वाली उनकी मूर्तियां स्पष्ट तौर पर उनकी सोच को दर्शाती हैं। इस पांच दिवसीय प्रदर्शनी में कांस्य, फाइबरग्लास और माइल्ड स्टील से बनाई गईं कलाकृतियां पेश की जाएंगी। ये कलाकृतियां कार्यालयों में कार्यरत महिलाओं, शांतिनिकेतन के आसपास मौजूद पशुओं और वनस्पति जीवन से प्रेरित हैं।


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जीवन के विश्लेषणात्मक समझ के साथ किरण के काम में उनका अनुभव भी दिखता है। प्रदर्शनी के केंद्र में सर्कस गर्लस्, गर्लस् आॅन साइकल, हनुमान और बर्ड्स आफ माई इमेजिनेशन हैं। तीन महिला आर्टवक्र्स तीन राज्यों बंगाल-ट्राइबल-संथल लेडी, पीठ पर बच्चे को लादे पूर्वोत्तर की महिला और आखिर में पंजाब, महिलाएं जहां से भी ताल्लुक रखती हों उन्हें समानता का अधिकार मिलना चाहिए। आसपास के माहौल से प्रेरित कलाकृतियों में द बिली गोट भी शामिल है। यह कलाकृति विशेष तौर पर रोजाना की खूबसूरती और हमारे जीवन की सामान्य लगने वाली चीजों को दर्शाती है। खजूर गच-डेट ट्री हमारे लैंडस्केप का हिस्सा हैं और उनका एक अलग व अनूठा आकर्षण होता है।
कलाकार की प्रत्येक कलाकृति में ऐसे विषयों को छुआ गया है जो एक व्यक्ति व समाज के तौर पर हमारे रोजमर्रा के जीवन का हिस्सा है। आदिवासी महिलाएं अपने हस्तशिल्प, मेहनत और आज़ादी व समानता को दर्शाती हैं जो तथाकथित शहरों में देखने को नहीं मिलती है। ये कलाकृतियां करीब 6 फुट ऊंची हैं और स्टील व आयरन की बनी हुई हैं।
प्रदर्शनी के विषय में किरण दीक्षित थापर ने कहा, इंग्लैंड में 30 साल तक रहने और फिर 2000 में भारत लौटने पर मैंने शांतिनिकेतन को अपना घर बनाया। यही वह जगह है जहां मैंने अपने विचारों को कला के जरिए दर्शाया है और तभी से मैं वार्षिक प्रदर्शनी लगा रही हूं। लॉ फेमे फैटेल्स - वीमेन विद गंप्शन भी मेरी मां राज थापर आहूजा, अमृता शेरगिल, सिमॉन डी-ब्यूवॉ, तस्लीमा नसीर, फरीदा काहलो समेत कई ऐसी मजबूत महिलाओं को समर्पित है जिन्होंने हमें बांधने वाले समाज के दायरों को तोड़ने की कोशिश की है। यह समारोह कला भवन (शांतिनिकेतन) और एक बेहद करीबी दोस्त दिवंगत डॉ. चंद्रशेखर व्यास के 100 साल पूरे होने का जश्न मनाने का भी सबसे बेहतरीन तरीका है।

प्रदर्शनी :-लॉ फेमे फैटेल्स-किरण दीक्षित थापर की कलाकृतियों की प्रदर्शनी
कबः रविवार, 20 अक्टूबर, 2019 से शुक्रवार, 25 अक्टूबर 2019 तक
कहांः विजुअल आर्ट गैलरी, गेट 2, इंडिया हैबिटैट सेंटर, नई दिल्ली

समयः सुबह 10ः30 बजे से शाम 7ः00 बजे तक

Thursday, October 10, 2019

भारत में लगी सालों पहले चुराई गई मूर्तियों की प्रदर्शनी

Narendra Modi brought back statues worth billions of rupees stolen


शाही शानो शौकत भला कैसी होगी? यह सवाल अक्सर जेहन में आता है। उनका रहन-सहन कैसा होगा? राजदरबार कैसे लगता होगा? इन सभी सवालों के जवाब पुराना किला के नए खुले संग्रहालय में मिलेंगे। यहां शाही घराने की शानो शौकत, शाही पुरुषों का लिबास, राजदरबार, शिविर समेत राजदरबार में संगीत का आनंद लेते राजकुमार की एक से बढ़कर एक हाथी दांत पर बनी 17वीं-19वीं सदी की कलाकृतियां प्रदर्शित की गई है। इसके अलावा भी दूसरी सदी से लेकर 19वीं सदी के पुरावशेष प्रदर्शित किए गए है। ये पुरावशेष चोरी या फिर किसी अन्य कारणों से देश से बाहर गए थे। जिसे सीबीआई समेत अन्य जांच एजेंसियों व पीएम नरेंद्र मोदी की मदद से वापस लाया गया है।

शाही कलाकृतियां
संग्रहालय में हाथी दांत श्रेणी में कई कलाकृतियां प्रदर्शित है। संग्रहालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि यहां हाथी दांत पर बनी करीब 20 से ज्यादा कलाकृतियां प्रदर्शित है। इसमें उत्तर भारत के एक दरबार का दृश्य है, जिसमें राजकुमार मौजूद है। जबकि शिविर दर्शाती कलाकृतियां भी है।17वीं शती की राजकुमार को संत द्वारा उपदेश देते समय की कलाकृति भी मौजूद है। राजदरबार में संगीत का आनंद उठाते राजकुमार, शिविर में बच्चे, जानवर, शतरंज खेलते राजकुमार समेत शाही पुरुष के करीब छह रुपचित्र भी है। पदाधिकारी की मानें तो इन कलाकृतियों से उस समय के राज घराने के बारे में काफी जानकारी मिलती है। हाथी दांत पर ही बनी 17वीं सदी की देवी की प्रतिमा, ईसाई संत, मदर मैरी, पंचशीर्ष देवता, स्त्री प्रतिमा, राजस्थानी लघुचित्र, कमल चित्र भी प्रदर्शित है।



ये हैं खास आकर्षण
संग्रहालय में प्रवेश करते ही सबसे पहले पुरावशेषों के अवैध व्यापार के बारे में बताया गया है। किस तरह इन पुरावशेषों को बरामद किया गया, यह भी बताया गया है। इसके बाद बलुआ पत्थर और ग्रेनाइट से बनी सिंह प्र्रस्तर, गज व्याल एवं 9वीं शती का द्वारपाल प्रदर्शित है। इसके बाद मौर्यकालीन मातृदेवी की प्रतिमा प्रदर्शित है। पदाधिकारी ने बताया कि प्राचीन काल से ही मातृदेवी को विभिन्न संस्कृतियों एवं सभ्यताओं द्वारा दर्शाया गया है तथा प्रकृति, मातृत्व, सृजन, विध्वंस का मूर्त प्रतीक माना गया है। भारतीय कला में मातृ देवी को प्रतिमा के रुप में दर्शाने का चलन सिंधु घाटी सभ्यता के समय से लेकर मध्य काल तक प्रचलित रहा है। मौयकालीन मातृदेवी की यहां प्रदर्शित प्रतिमा हार, कुंडल, चूड़ियों आदि के अलंकरण है। जिसका शिरोभाग भी अलंकरण युक्त है। यह प्रतिमा न्यूयार्क स्थित होमलैंड सिक्योरिटी द्वारा आर्ट आफ पास्ट नामक कला वीथिका के मालिक सुभाष कपूर के गोदाम में बरामद की गई थी। जिसे 2016 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के न्यूयार्य दौरे में प्रयुुक्त हवाई जहाज द्वारा वापस लाया गया था। यहीं पास ही चोल कालीन श्रीदेवी की प्रतिमा भी प्रदर्शित है। संगमरमर की बनी 14वीं शती की ब्रम्हा ब्रम्हाणी की मूर्ति दर्शकों को ठहरने के लिए बाध्य कर देती है। भगवान विष्णु की कई प्रतिमाएं प्रदर्शित है जो अनंतशायी मुद्रा, वराह, चतुर्भुज बैकुंठ की बलुआ प्रस्तर से बनी प्रतिमाएं हैं। उत्तर प्रदेश के भीतरगांव से चुराई गई 4-5वीं सदी की गण की मृणमय प्रतिमा भी प्रदर्शित है। इसे संयुक्त राज्य अमेरिका स्थित लास एंजलिस काउंटी संग्रहालय ने स्वेच्छा से लौटाया है। यह वहां कैसे पहुंची यह पता नहीं चल सका है। संग्रहालय में ताम्र निर्मित वस्तुएं, भारतीय सिक्के, पार्वती की प्रतिमा, नटराज की प्रतिमा, तांबे के औजार प्रदर्शित है।

Friday, September 20, 2019

दिल्ली में गूंजे मीरा के भजन

सिरीफोर्ट ऑडिटोरियम में मीरा द म्यूजिकल शो दर्शकों को भक्ति के भाव से सराबोर कर गया। 90 मिनट की प्रस्तुति के दौरान शायद ही कोई दर्शक अपनी सीट से उठा हो। जो यह बताने के लिए काफी है कि किस कदर दर्शक इस कार्यक्रम में खो गए थे। करीब 183 कलाकारों की बेहतरीन प्रस्तुति दर्शक ताउम्र याद रखेंगे लेकिन उससे भी ज्यादा कौतुहल दर्शकोंको यह जानकार हुई कि करीब 90 फीसद कलाकारों ने पहली बार स्टेज पर प्रस्तुति दी है। उसमें से भी 70 स्कूली बच्चे थे।

https://en.wikipedia.org/wiki/Meera

राजघराने का ठाठ
ऑडिटोरियम में मानों राजपूतानी शानो शौकत जीवंत हो उठी हो। स्टेज पर लकड़ियों से बना किला एवं एलईडी स्क्रीन का इतना बेहतर प्रयोग किया गया कि दर्शक भी भाव विभोर हो गए। एलईडी स्क्रीन पर पक्षियों की चहचहाहट और किले के खूबसूरत दृश्य के साथ मीरा द म्यूजिकल शो का आगाज होता है। मेड़ता के राजघराने में एक बच्ची पैदा होती है जिसका नाम मीरा रखा जाता है। मीरा का पालन पोषण उनके दादा की देखरेख में होता है जो खुद भी विष्णु के उपासक थे। उनके गुरू एक दिन आते हैं और कहते हैं कि उन्हें ऐसा भान हुआ कि कोई पवित्र आत्मा रह रही है। बस उसे देखने की लालसा में आ गए। वो मीरा को एक कृष्ण की मूर्ति भी देते हैं---यहीं से मीरा का कृष्ण के प्रति भक्ति और बढ़ जाती है। अगले ही पल नन्हीं मीरा, कृष्ण की मूर्ति लिए नृत्य करते हुए गातीं हैं कि---
घनश्याम आया रे मेरे घर श्याम आया रे
घनश्याम आया रे मेरे घर श्याम आया रे
अधर पर है प्राण उसके
हाथ में मुरली।।

बारात देख, मीरा के प्रश्न
शहनाई बजती है। कुछ लोग नृत्य कर रहे हैं। दुल्हा-दुल्हन के उपर छत्र लगा है। मीरा बड़ी मासूमियत से पूछती है कि ये क्या है। युवती बोलती है कि ये शादी हो रही है। मीरा दुल्हे के बारे में पूछती है तो मीरा से ये कहा जाता है कि वो भी जब बड़ी होंगी तो उनकी शादी कृष्ण जैसे किसी राजकुमार से होगी। बैकग्राउंड में गीत बजता है।
आज घूंघट में छिपी हूं
मिलन बेला में
आज घूंघट में छिपी हूं
मिलन बेला में
मान अब कैसे करूं मल्हार लाया रे
घनश्याम आया रे मेरे घर श्याम आया रे।।
इसके बाद मीरा की चचेरी बहन की कहानी पर्दे पर दिखाई जाती है।कैसे उनकी शादी की बात चलती हैं एवं किन परिस्थितियों में वो खुदकुशी करती है। मीरा इस घटना से बहुत ही द्रवित हो जाती है। वो परेशान हो जाती हैं।ऐसे में उनका एकमात्र सहारा गिरधारी लाल बनते हैं। बाद के दृश्य में मीरा की शादी हो जाती है। जब वो अपने ससुराल पहुंचती है तो वहां उनका धूमधाम से स्वागत होता है। उनके स्वागत में बकरे की बलि की बात कही जाती है तो मीरा विरोध दर्ज कराती हैं। कहती हैं कि प्राण लेना गलत है।क्यों कि भगवान सभी के अंदर है। इसके बदले में हम एक कटोरा खीर खा सकते हैं। वो अपनी मासा को समझाती हैं कि मनुष्य को अपने अंदर की गलत आदतों की बलि देनी चाहिए। इस पर मीरा को बताया जाता है कि बलि तो दी ही जाएगी। मीरा भी जिद पर आ जाती हैं कि यदि बलि दी गई तो वो महल में प्रवेश नहीं करेंगी। बाद में ससुर के हस्तक्षेप से बलि नहीं दी जाती हैं एवं मीरा की तारीफ होती है। यह कहानियां ऑडिटोरियम में बैठे दर्शकों समेत बच्चों को प्रभावित करती है। गीत बजता है--हरि मेरे जीवन प्राण आधार।
सूूत्रधार कहता है कि मीरा की जिंदगी कृष्ण के इर्दगिर्द घूमती है। वो घर के सभी कामकाज करने के बाद चित्तौड़ के कृष्ण मंदिर में जाकर पूजा करती है। वहां गांव वालों को कृष्ण की कहानियां सुुनाती है। मीरा गाती हैं---
नटवर नागर नंदा
भजो रे मन गोविंदा
सब देवों में देव बड़े हैं,
श्याम बिहारी नंदा, भजो रे मन गोविंदा॥
लेकिन बहुत जल्द पति तक यह बात पहुंच जाती है कि मीरा शहर में मंदिर में जाकर आम लोगों के बीच भगवान के भजन गाती है। पति पहले तो समर्थन करते हैं लेकिन मां के दबाव में झुुक जाते हैं। अंत में वो मीरा से कहते हैं कि वो कृष्ण का एक मंदिर महल के अंदर ही बना देंगे। मीरा खुशी से झूम उठती हैं। कहती हैं- क्या ये मंदिर मेरे लिए बनवाया जाएगा।
मंदिर बन जाता है। मीरा मंदिर में ही पूजा करती है। लेकिन मीरा की ननद उदा यहां भी पहुंच जाती है। कहती हैं कि राजपूत रानी का पति ही उसका भगवान होता है। मीरा, उदा से कहती हैं कि भगवान ही मेरा पति है। मीरा के भजनों से नदियों की लहरें इठलाती हैं। जंगल में पशु पक्षी भी भक्ति में झूमते हैं।
मीरा गाती हैं---
कुंजन वन छाड़ि ए माधो
कहां जाउं, उन धाम
जो मैं होती जल की मछलिया
जब प्रभू करते, हो स्नान
चरण छू लेती हो माधो
कहां जाउं उन धाम।।
इस गाने की खासियत बताते हुए मीरा का किरदार निभाने वाली श्रीविद्या वर्चस्वी कहती हैं कि इस नृत्य की खासियत योग का चमत्कारिक प्रभाव दिखाना है। आमतौर पर योग को सिर्फ आसनों के जरिए दिखाया जाता है। लेकिन इस नृत्य में हमने आसन के जरिए मीराबाई जो कहना चाहती हैं उसे दिखाया। मसलन, भगवान से मिलन, दीपक जलना, भौरों, मयूरों का नृत्य आदि को आसन के जरिए दर्शाया गया। मयूर नृत्य तो वृंदावन का खास है। जबकि नृत्य की इस कड़ी में राजस्थान की कठपुतली कला का भी प्रदर्शन किया गया।
कार्यक्रम में दिखाया गया कि मुगल बादशाह भी मीरा के भजनों पर मुग्ध हो जाता हैं एवं एक दिन खुुद मंदिर आकर उनका भजन सुनता है। मीरा भजन गाती हैं कि--
सांवरी सूरत, मोहनी मूरत
नैंना हैं विशाल
बसो मेरे नैनं में नंदलाल।।
बादशाह, मीरा को उपहार देना चाहता है लेकिन मीरा यह कहकर भगवान को समर्पित करती है कि सब भगवान की देन है। यह बात जब राजपूत राजा को पता चलती है तो वो मीरा को घर से निकल जाने का फरमान सुनाते हैं। मीरा, गुस्से में आकर नदी में खुदकुशी करने पहुंचती है लेकिन एक दिव्य ज्योति उनका मार्गदर्शन करती हैं एवं उन्हें ज्ञान देती है। जिसके बाद मीरा गुरू की तलाश में भटकती है। गुरू मिलने पर वो देश दुनिया से बेखबर हो कृष्ण की भक्ति का प्रसार करती है। हालांकि बाद में उनके पति को अपने किए पर पछतावा होता है तो वो मीरा को मनाकर वापस महल ले आते हैं। लेकिन उनकी मौत के बाद मीरा को कई तरह से परेशान किया जाता है। उन्हें जहर देकर मारने की भी कोशिश की जाती है। लेकिन मीरा सलामत बच जाती है। कार्यक्रम का आखिरी दृश्य बहुत ही मनोरम है। जिसमें मीरा द्वारका पहुंचती है एवं स्टेज पर कृष्ण की भव्य मूर्ति के दोनों तरफ कलाकार पूजा करते हैं।

कमाल के कलाकार
विद्या कहती हैं कि करीब 90 कलाकार थे, 70 स्कूली बच्चे थे। ये सभी व्यक्तिगत रुप से रिहर्सल कर रहे थे। कार्यक्रम के एक दिन पहले ही सभी मिलकर रिहर्सल कर पाए थे। लेकिन सबने शानदार अभिनय एवं नृत्य किया। मीरा के दस बहुत कम सुने भजनों के चुनने की प्रक्रिया के बारे में विद्या ने बताया कि करीब दो महीने हमनें कड़ी मेहनत की थी। हम मेवाड़ और चित्तौड़ भी गए। वहां स्थानीय लोगों से भी भजन पूछा। इतिहासकार डॉ हरि ने बहुत सहयोग किया। करीब एक महीने हमें दस भजनों के संगीत तैयार करने में भी लगे। खुद, विद्या ने पहली बार मीरा आधारित प्रस्तुति दी थी। कहती हैं, भावना और ज्ञान से कैसे मन को मुक्त किया जा सकता है यह मीरा से सीखा जा सकता है।


Friday, September 13, 2019

मन में है दिल्ली

Man me hain delhi 
सुबह सूरज की किरणों से जामा मस्जिद नहा रहा है। हाथ ठेला बिना शोर के चले जा रहा है। कनॉट प्लेस सर्किल पर आइसक्रीम खाते लोग हैं तो कहीं किसी वाटरकलर पेंटिंग में ऑटो का इंतजार करते लोग। पुरानी दिल्ली की संकरी गलियों में साइकिल पर पैडल मारता पेपरवाला हो या फिर चांदनी चौक की पुरानी हवेली का भव्य दरवाजा। पेंटिंग में ये नजारे मानों जीवंत हो उठे हैं। ये न सिर्फ आंखों को सुहाते हैं ब्लकि अपने दामन में किस्से कहानियों का संसार समेटे हैं। जो हर दिल अजीज है। दिल्ली की दिलकश खूबसूरती को कलाकृतियों के जरिए प्रस्तुत कर रहे हैं कृष्णेंदु चटर्जी। जिनकी कलाकृतियों की प्रदर्शनी इंडिया हैबिटेट सेंटर में चल रही है।
https://en.wikipedia.org/wiki/Jhandewalan_Temple

दिलवालों की दिल्ली
कृष्णेंदु कहते हैं कि इंडिया हैबिटेट सेंटर में उनकी 30 कलाकृतियां प्रदशि्रत है। अधिकतर कलाकृतियां पुरानी दिल्ली पर आधारित है जबकि कनॉट प्लेस, संसद भवन समेत लुटियन दिल्ली आधारित भी कलाकृतियां है। इन कलाकृतियों की खासियत वाटर कलर है। बकौल कृष्णेंदु वाटरकलर पेंटिंग के लिए तकनीकी रुप से दक्ष एवं लाइट एंड शेड का विशेषज्ञ होना चाहिए। कलाकृति बनाने के दौरान उन्होंने पूरी कोशिश की है कि कलाकृति दिल्लीवालों के दिल में बस जाए। इसमें वो काफी हद तक सफल भी रहे हैं। पुरानी दिल्ली की संकरी गलियों में किस तरह जिंदगी हंसती मुस्कुराती है, इसकी झलक कलाकृतियों में मिलती है। गलियों में साइकिल लेकर चलता पेपरवाला, बिजली के खंभों से लिपटे-झुलते बिजली के तार, गलियों में ही रखे पुराने स्कूटर, कहीं किसी हवेली का पुराना मजबूत दरवाजा, जिसकी नक्काशी दिल को खुश कर देती है। पुरानी दिल्ली की गलियों में सिर पर सामान उठाए जाता कर्मचारी, गलियों में ही खड़े हाथ ठेला गाड़ियां। जामा मस्जिद की खूबसूरती। कनॉट प्लेस का खुलापन। ये सब दर्शक देखकर वाह वाह कर उठते हैं। झंडेवालान का विश्व प्रसिद्ध हनुमान मंदिर आधारित कलाकृति भी शानदार है। सामने से वाहनों का गुजरना, क्रेन का खड़ा होना, राहगीरों का फुटपाथ पर चलना सरीखे दृश्य इसे जीवंत बना देते हैं।

दिल्ली दिल है
फोटोग्राफर एवं कलाकार कृष्णेंदु कहते है कि दिल्ली मेरे मन में हमेशा रहा है, रहा था और रहेगा। कलाकार की नजर से देखें तो दिल्ली में सब्जेक्ट बहुत ज्यादा है। मेरी दिल्ली आधारित पांच प्रदर्शनी पहले भी लग चुकी है। गत वर्ष यमुना नदी पर प्रदर्शनी लगी थी, जिसे काफी सराहा गया। प्रदर्शनी, दूर्गा पूजा के बाद मूर्तियों के विसर्जन के बाद के हालात दिखाया गया था। इसके पहले कि प्रदर्शनी फोटो आधारित थी। इस बार पहली बार वाटरकलर प्रदर्शनी आयोजित की गई है। जिसमें दिल्ली की खूबसूरती उभारने की कोशिश की गई है।

वाटर कलर ही क्यों
कृष्णेंदु कहते हैं कि वाटर कलर दरअसल एक फन होता है। यह एक एडिक्ट की तरह होता है। आयल पेंटिंग के मुकाबले वाटर कलर में टाइम कम लगता है, रिजल्ट तत्काल मिल जाता है। हालांकि इसमें तकनीक महत्वपूर्ण है। जिन जगहों की मैंने कलाकृति बनाई है, उन जगहों पर अक्सर जाना हुआ है। रात में मैं बैठकर पेंटिंग बनाता था। इसे बनाने में दो से चार घंटे तक लगते थे।



Friday, September 6, 2019

कहानी कनॉट प्लेस के बनने की

connaught place history

दिल्ली का दिल कनॉट प्लेस..जिसकी हर सांस संग दिल्ली धड़कती है। सफेद खूबसूरत भवनों की शालीनता किसी के भी दिल को छू लेती है। तभी तो सालों बाद भी इसकी धमक बरकरार है। कनॉट प्लेस का जिक्र 1911 के दिल्ली दरबार के बिना अधूरा है। किंग जॉर्ज पंचम ने 12 दिसंबर, 1911 में 80 हजार से भी ज्यादा लोगों की मौजूदगी में कोलकाता से दिल्ली को राजधानी बनाने की घोषणा की थी। 15 दिसंबर को जब आधारशिला रखी गई तो किंग ने उस पर लिखा गया कि -ये मेरी तमन्ना है कि जब नई राजधानी बनाई जाए, तो इस शहर की खूबसूरती और प्राचीन छवि को ध्यान में रखा जाए, ताकि यहां नई इमारतें इस शहर में खड़ी होने लायक लगें। कुछ इसी तरह के सपनों को आंखों में संजोये नई दिल्ली की छांव में कनॉट प्लेस का विकास हुआ।


दिल्ली को राजधानी बनाने की घोषणा के साथ ही विरोध के स्वर भी मुखर हुए। द बंगाल चैंबर्स अाफ कामर्स समेत कई संगठनों ने विरोध किया। स्टेटमेंट, पायनियर, अमृत बाजार पत्रिका में भी लेख छपे। दिल्ली के मौसम पर भी अंगुलिया उठाई गई। कहा गया कि मौसम बुखार और फोड़े-फुंसियों का सबब बनता है। दिल्ली को पंजाब का बेजान पानी और व्यवसायिक गतिविधियों वाले प्रमुख केंद्रों मसलन मुंबई, कलकता, से दूर बताकर उलाहना भी दी गई। कहा गया कि यह सिर्फ अधिकारियों की बस्ती बनकर रह जाएगा। 1912 तक राजधानी स्थानांतरण के फैसले की आलोचना होती रही लेकिन लार्ड हार्डिंग इसके महत्व को समझता था। वह जल्द से जल्द राजधानी स्थानांतरण का समर्थक था। वह चाहता था कि नई राजधानी बनाने का काम पीडब्ल्यूडी काे ना देकर एक कमेटी को दिया जाए जो संख्या में छोटी जरूर हो लेकिन अधिकारी ज्यादा हो। इस तरह टाउन वेंडिंग कमेटी परवान चढ़ी और नामों पर विचार किए जाने शुरू हुए। पहले पहले म्यूनिशिपल इंजीनियर जॉन ए ब्रॉडी और जार्ज स्वींटन का नाम सुझाया गया। इन्होंने भारत में कई साल गुजारे थे एवं इन्हें यहां रहने का अनुभव भी बहुत ज्यादा था। खैर, टाउन प्लानिंग कमेटी का गठन हरबर्ट बेकर, लुटियंस के नेतृत्व में हुआ। 15 अप्रैल 1912 को कमेटी के सदस्य दिल्ली पहुंचे। इन्हें सिविल लाइंस स्थित मेडन होटल में ठहराया गया। यहां वो करीब पांच सप्ताह तक रहे। गर्मी की भीषण गर्मी झेलने के बाद 20 मई को वो शिमला रवाना हुए। जहां हिल स्टेशन के खूबसूरत मौसम के बीच फाइनल राउंड की बैठक सम्पन्न हुई। 13 जून को कमेटी ने राजधानी बनाने के लिए उचित स्थान के चुनाव को लेकर फाइनल रिपोर्ट सौंपी।
राजधानी बनने की निरंतर प्रकि्रया के दौरान ही कमर्शियल शापिंग सेंटर के रूप में कनॉट प्लेस विकसित हुआ। हालांकि जब कलकत्ता से दिल्ली राजधानी स्थानांतरित की गई तभी शापिंग सेंटर बनाने की बात उठी थी। कलकत्ता की यूरोपियन कमर्शियल कम्यूनिटी के सदस्यों की तरफ से एक मांग की गई, जिसमें कहा गया कि एक ही सड़क पर मॉल्स, डिस्ट्रिक सेंटर बनाया जाए ताकि शापिंग आसान हो सके। कमेटी ने बाद में प्राइवेट फर्मों को कहा कि उन्हें उचित रेट पर यहां शॉप अलॉट किए जाएंगे। कमेटी ने 1913 में शापिंग के लिए शहर के नार्थ की तरफ जगह चिन्हित की थी। एक सर्किल के रूप में इसका ले आउट बनाया गया जबकि इसके सेंट्रल पोर्शन में रेलवे टर्मिनल बनाने का प्रस्ताव रखा गया। तय हुआ कि इस रेलवे स्टेशन के सामने प्रशासनिक अधिकारी, नगर निगम के अधिकारियों के अलावा पोस्ट आफिस, दुकानें व होटल बनाए जाएंगे। सन 1914 में अत्यधिक खर्चीली बता इस योजना को नामंजूर कर दिया गया। हालांकि स्टेशन बनाने के आइडिया शहर से और उत्तर की तरफ बनाने को मंजूरी दी गई। भवनों को प्राइवेट इन्वेस्टर्स से बनवाकर ब्लॉक को बेचा गया। कनॉट प्लेस बसाने की योजना वास्तुविद एच निकोलस की थी, लेकिन अंजाम दिया वास्तुविद राबर्ट टॉर रसल ने। कनॉट प्लेस की बनावट घोड़े की नाल की बनावट से मेल खाती है और इसके ढांचे की प्रेरणा ब्रिटेन स्थित रॉयल क्रीसेंट से ली गई थी। यह इलाका माधोगंज गांव के नाम से जाना जाता था। जहां चारों ओर जंगल था। माधोगंज गांव जयपुर के महाराजा जयसिंह की रियासत का हिस्सा था। उन्होंने यह जगह अंग्रेजो को भेंट की। बाकी कुछ जगह दो रुपये प्रति वर्ग मीटर की दर से स्थानीय लोगों से खरीदी गई। ड्यूक ऑफ कनॉट के नाम पर अंग्रेज बहादुरों की गोरी मेमों के सैर-सपाटे के लिए बसाए गए इस बाज़ार की शक्ल बिल्कुल अलग थी। इनर सर्किल को कनॉट प्लेस जबकि आउटर सर्किल को कनॉट सर्किल नाम दिया गया था। जबकि इनके बीच आेपन एरिया को बहुत ही अच्छे तरीके से व्यवस्थित किया गया था एवं यहां प्रत्येक सप्ताह शनिवार को बैंड म्यूजिक का आयेाजन होता था। संगीत का यह आयोजन अक्टूबर के मध्य से अप्रैल के मध्य तक होता था। जब राजधानी छह महीने के लिए शिमला चली जाती थी तो कनॉट प्लेस भी वीरान सा हो जाता था। अपनी किताब कनॉट प्लेस एंड द मेकिंग आफ न्यू दिल्ली में स्वप्ना लिडले लिखती हैं कि कनॉट प्लेस को बनाया ही अमीरों की सहुलियत के लिए था। इसे बनाने के दौरान ध्यान रखा गया था कि यहां मोटर व्हीकल आसानी से मूव कर सकें। जबकि जिन्हें पुरानी दिल्ली घूमनेजाना होता था वो तांगे या बस से जाते थे। इलेक्ट्रानिक बसें यहां 1934 में चलनी शुरू हुई। जो सिविल लाइंस और पुरानी दिल्ली को नई दिल्ली से जोड़ती थी। कनॉट प्लेस के दो ब्लॉक में 1927-28 एवं 1929-30 में लोग शिफ्ट हुए। आउटर रिंग कनाट सर्किल पर 10 ब्लॉक बने थे। जिसमें बड़े संस्थान के आफिस थे। इन्हीं में स्टेटमेंट एवं बुमराह सेल्स आयल के आफिस थे। यहीं सिंधिया हाउस भी हुआ करता था।
यहां थियेटर बनने के पीछे की कहानी भी काफी दिलचस्प है। शोभा सिंह ने सीपी में 3.44 एकड़ जमीनी पर थियेटर बनाने की योजना बनाई। करीब छह लाख रुपये में थियेटर बनाने की योजना को 1930 में मंजूरी भी मिल गई। इसमें सिनेमा हाल के अलावा अन्य सुविधाएं भी थी। यह 1932 में बनकर तैयार हुआ। इस तरह रीगल सिनेमा दुनिया केसामने आया। इसका मैनेजमेंट खुद शोभा दीपक सिंह देखते। इसका उद्देश्य धनाढय लोगों को आकर्षित करना था। यहां बार भीहोता था। इसे देखते ही देखते अन्य थियेटर भी अस्तित्व में आए। जैसे 1933 में प्लॉजा, 1940 में ओडियन, 1941 में रिवोली बना। हालांकि इसमें सिर्फ अंग्रेजी फिल्में ही प्रदर्शित की जाती थी। इंडियन फिल्म के लिए भी एक थियेटर खोला गया जिसका नाम रायसीना थियेटर रखा गया। इरविन रोड पर सेठ ब्रदर्स ने सन 1938 में यह थियेटर बनवाया था। यहां एक कहानी और दिलचस्प है कि इन स्थायी थियेटर से पहले एक अस्थाई थियेटर भी था। 1929-30 की ब्रिटिश डायरेक्टरी में प्रिंस आफ वॉल्स सिनेमा का जिक्र मिलता है। जो तालकटोरा गार्डन में बनाया गया था।
बकौल स्वप्ना कनॉट प्लेस से बाद के वर्षों में कमर्शियल एक्टीविटी आगे बढ़ती चली गई। वैसे 1920 में ही गोल मार्केट बन गया था। नई दिल्ली में बना यह पहला मार्केट था। 1928-29 में एक प्राइवेट फर्म ने बेयर्ड रोड और लेडी हार्डिंग रोड पर दुकानों की एक श्रृंखला खोली। उसने इसका नाम पार्लियामेंट स्ट्रीटरखा। दिलचस्प है कि कई सालों तक इसे पार्लियामेंट स्ट्रीट के नाम से ही जाना जाता था। इसी रोड पर 1 जनवरी 1926 को इम्पीरियल बैंक आफ इंडिया भी खुला। रॉयटर इसी बिल्डिंग में 1928 में शिफ्ट हुआ था।
दिल्ली के पहले होटल के खुलने की गाथा भी यहीं से जुड़ी है। दरअसल, नारायण सिंह ने क्वीन वे पर 8 एकड़ जमीन पर अपने बेटे रंजीत सिंह के साथ 1936 में दिल्ली के पहले एवं सबसे बड़े होटल इम्पीरियल का शुभारंभ किया। इसका डिजाइन आर्ट डे को कि स्टाइल में आर्किटेक्चर सीजी और एफबी ब्लोमफील्ड ने बनाया था।
1940 तक आते आते यह दिल्ली का सबसे पसंदीदा फैशनेबल शापिंग सेंटर बन गया था। यहां कई ब्रांड पुरानी दिल्ली समेत दिल्ली के बाहर से भी आए थे। जैसे लग्जरी घड़ी बनाने वाली कुक एंड केलवे कंपनी ने कलकत्ता से अपनी शाप यहां खोली। चांदनी चौक-कश्मीरी गेट की प्रसिद्ध इंडियन आर्ट पैलेस भी 1936 में यहां खुला। रॉयल हेयर ड्रेसिंग जो लंदन में बाल काटना सीखने वालों को ही नौकरी पर रखते थे कि दुकान खुली। कनॉट प्लेस में ब्रांडेड शोरुम खुले दूसरी तरफ गोल मार्केट में ग्रोसरी शॉप, फिश शॉप खुली। कारण, सीपी में अमीर लोग ही शापिंग करते थे जबकि गोलमार्केट में उनके यहां के घरेलू सहायक रोजमर्रा की शािपंग करने जाते थे।
फूड बिजनेस की सीपी में शुरूआत भीकाफी दिलचस्प थी। डविको लिमिटेड ने यहां इसी दरम्यान दुकान खोली थी। वो बड़े ही गर्व के साथ दुकानपर कहते थे कि उन्हें वायसराय ने अनुमित दी है। यह शॉप पहले कश्मीरी गेट में होती थी। बाद में सीपी में लंच, डिनर के लिए रेस्त्रां खोला। इसका प्रमुख आकर्षण आर्केस्ट्रा और ट्री डांस था जो हर बृहस्पतिवार और शनिवार को होता था।
यहां किताबों की दुकानें भी खूब खुली।जैसे इ डी गलगोटिया एंड संस, न्यूज एजेंट, बुकसेलर्स, अमृत बुक कंपनी और इंगलिश बुक कंपनी की दुकानें खुली। रामचंद्र जैन जिनकी पुरानी दिल्ली में प्रिंटिग प्रेस की दुकान थी, उन्होंने 1936 में यहां धूमिमल के नाम से पहली आर्ट गैलरी खोली। द्वितीय विश्व युद्ध के समय सीपी में भीड़ खूब बढ़ गई। कारण, यह केंद्र बिंदु होता था।
पहला सक्सेसफुलब्रांड
किशोरी लाल लांबा सन 1940 में लाहौर से दिल्ली आए थे। वो हाथ से आइसक्रीम बनाकर कनॉट प्लेस में बेचते थे। नाम उन्होंने क्वालिटी दिया था। अमेरिकी सैनिकों को यह आइसक्रीम खूब पसंद आती थी। एक दिन अमेरिकी वेटेरेनरी सर्जन ने उन्हें इसके व्यवसाय का आइडिया दिया और इस तरह दिल्ली ही नहीं भारत का पहला सबसे सक्सेसफुल ब्रांड क्वालिटी अस्तित्व में आया। समय के साथ कनॉट प्लेस की यात्रा अब भी जारी है। कनॉट प्लेस की यह खूबसूरती ही है जो सालों बाद भी लोगों में इसका क्रेज बरकरार है। दिल्ली में आजादी के बाद से कई बाजार खुल गई लेकिन आज भी दिल कनॉट प्लेस में ही धड़कता है।



Saturday, August 17, 2019

कबीर के दाेहे पर रंजना गौहर का नृत्य

ranjana gauhar dance on kabir couplets

इंडिया हैबिटेट सेंटर में आयोजित दो दिवसीय शास्त्रीय नृत्य-संगीत का यह कार्यक्रम कई मायनों में बहुत ही खास था। एक से बढ़कर एक कलाकारों की प्रस्तुति ने दर्शकों का दिल जीत लिया। मंगलवार को हुए उद्घाटन समारोह की प्रस्तुति कुछ ऐसी थी कि दर्शक सुरधारा में डूब ही गए। ऑडिटोरियम दर्शकों से खचाखच भरा था। दिल्ली ही नहीं एनसीआर के कोने कोने से लोग आए थे। ऐसे भी अभिभावक थे जो अपने बच्चों को देशभक्ति की उस अनुपम सुरधारा से साक्षात्कार करवाना चाहते थे जो इस कार्यक्रम में प्रवाहित होने वाली थी। शुरुआत कला क्षेत्र के दिग्गजों को सम्मानित करने से हुई। इस सुरमयी शाम का अगला पड़ाव कबीर की रचनाअों पर आधारित था। जिसपर पदमश्री गुरू रंजना गौहर की प्रस्तुति यादगार थी। जबकि बुधवार रात आलोक कानूनगो, डॉ अन्वेषा महंता, कविता ठाकुर,जया प्रभा मेनन और रानी खानम की शानदार प्रस्तुतियों ने दर्शकों को भाव विभोर कर दिया।


उत्सव सम्मान
गुरूवार रात कला एवं संगीत क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान देने वाले चार प्रसिद्ध शख्सियतों पदमश्री बंकिम सेठी, गुरू धनेश्वर सवाइन, आर्ट क्रिटिक मंजरी सिन्हा एवं प्र्रसिद्ध बांसुरी वादक चेतन जोशी को सम्मानित किया गया। बंकिम सेठी की जिंदगी सुर लय और ताल की तरह ही विविधताओं भरी है। जन्म ओडिशा में हुआ था। चूंकि पिता अपने समय के प्रसिद्ध संगीतकार थे लिहाजा इनकी संगीत शिक्षा सात साल की उम्र से ही शुरू हो गई। इन्होंने ना केवल ओेडिशा बल्कि दिल्ली में ओेडिशा नृत्य को जनसामान्य के बीच ले गए। जबकि गुरू धनेश्वर सवाइन मरदल को लोकप्रिय बनाए। इन्होंने अमेरिका, जापान, यूके, डेनमार्क, स्वीडन, दक्षिण कोरिया, इजराइल, इजिप्ट, ग्रीस आदि देशों में प्रस्तुति के जरिए शास्त्रीय नृत्य संगीत को समृद्ध कर चुके हैं। चेतन जोशी बांसुरी की धुन को भारत के कोने कोने तक पहुंचा चुके हैं। इसके अलावा जापान और दक्षिण कोरिया में भी प्रस्तुति दे चुके हैं। आर्ट स्कालर मंजरी सिन्हा गायन, तबला, सितार और कथक में दक्ष है। पदमश्री रंजना गौहर कहती हैं कि उत्सव : रंजना अकेडमी ऑफ ओडिशी डांस प्रति वर्ष नृत्य संगीत कार्यक्रमों का आयोजन करती है। सारे जहां से अच्छी उसी कड़ी का पड़ाव है। जिसमें सीनियर आर्टिस्ट की प्रस्तुति देशभक्ति का जज्बा जगाती है एवं शास्त्रीय नृत्य संगीत से दर्शकों को जोड़ती है।

खुद में कबीर, कबीर में हम
कबीर की रचनाओं के जरिए निगुर्ण भक्ति का भाव दर्शकों के सामने रखा गया। यह नृत्य ड्रामा प्र्रस्तुति दर्शकों को इस कदर पसंद आयी कि तालियां बजाकर अभिवादन किया। पदमश्री रंजना गौहर कहती हैं कि जब मैं कबीर पर प्रस्तुति के बारे में विचार कर रही थी सबसे ज्यादा चुनौतीपूर्ण इसका सब्जेक्ट चयन था, जो ना सिर्फ दर्शकों को पसंद आए बल्कि जिस पर नृत्य किया जा सके। ऐसा इसलिए भी जरुरी था क्यों कि कबीर का व्यक्तित्व बहुत ही गहराई भरे आध्यात्मिक, अमूर्त और दार्शनिक थे। कोई इसे नृत्य के लिए तो विशेष पसंद नहीं ही कह सकता है। लेकिन मैंने कबीर की भावनाओं को अपनी कला के जरिए दर्शकों तक पहुंचाने की ठानी। जब मैंने उनकी रचनाओं के बोल पढ़ने शुरू किए तो उनमें मुझे तुकबंदी और संगीत मिला। एक ओडिशी नृत्यांगना के नाते मुझे महसूस हुआ कि कबीर की रचनाओं में जितनी बेबाकी से बातों को कहा गया है, उसके लिए मुझे और क्रिएटीव मूवमेंट के साथ प्रस्तुति देनी होगी। यह भी पर्याप्त नहीं था कि मैं केवल उनके दोहों को पढ़ूं क्यों कि वर्तमान दौर में युवा पीढ़ी कबीर को ज्यादा नहीं जानती है। यह उनकी जिंदगी और परिस्थितियां थी, जिन्होंने कबीर को कबीर बनाया। इसलिए यह जरुरी था कि प्रस्तुति में कबीर केंद्र से ना हटे। खुद में कबीर और कबीर में हम के जरिए कबीर के व्यक्तित्व के साथ साथ उनके उस बेमिसाल काम को दर्शकों को बताना चाहते थे, जो सदियों बाद भी प्रासंगिक है। उनके दोहा सदियों से लोग पढ़ते-कहते एवं उसका अर्थ समझने की चेष्टा कर रहे हैं। बकौल रंजना गौहर यह प्रस्तुति विभिन्न सतहों में विभाजित थी। पहले लेयर में कबीर के शरीर के संदभ्5 में कहे दोहों को नृत्य के जरिए प्रस्तुत किया गया। जबकि दूसरे चरण में कबीर के उन दोहों पर आधारित थे। जबकि आखिरी लेयर उस सूत्रधार की थी जो दर्शकों से सीधा संवाद करता है। कबीर एवं उनके सोच के बारे में दर्शको को बताता है। इसमें सूत्रधार के रूप में गुरु रंजना गौहर व कबीर के रूप में केविन बच्चन ने दर्शकों को भावुुक किया। यह प्रस्तुति करीब 70 मिनट की थी। कबीर के जन्म का प्रसंग बहुत ही मार्मिक था। इस संगीतमय प्रस्तुति के बाद दर्शक अपनी सीट पर खड़े होकर तालियों से अभिवादन किए।

वंदे मातरम

दूसरे दिन की पहली प्रस्तुति अलोका कानूनगो की वंदे मातरम थी। बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा लिखित यह गीत कार्यक्रम के मूल संदेश की प्रतिमूर्ति थी। अलोका की शानदार प्रस्तुति ने दर्शकों में देशभक्ति की भावना का संचार किया। कई ऐसे मूवमेंट भी थे जिन्हें दर्शकों की भरपूर तालियां मिली। संगीत हिमांशु साइवान और धनेश्वर साइवान का था। जबकि श्रीपर्णा बोस, निवेदिता दत्ता, पाउलोमी चक्रवर्ती और सुवा्र मैती ने अपने नृत्य से दर्शकों का मन मोहा। अलोका की दूसरी प्रस्तुति जगत माता भी लाजवाब थी। दुनिया का प्रादुर्भाव, संरक्षण और विघटन सिर्फ जगतमाता के जरिए ही संभव है। इन्हें आदिशक्ति भी कहा जाता है। काली, तारा, भुुवनेश्वरी,त्रिपुरा, भैरवी, मातंगी, कमला आदि महादेवियों के रूप में पूजा की जाती है। अलोका कानूनगो ने तीन महादेवियों काली, छिन्नमस्ता और बगलामुखी पर आधारित प्रस्तुति दी। इसकी शुरुआत तीनों देवियों की स्तुति करते श्लोक से हुई। अलोका की अाखिरी प्रस्तुति पल्लवी थी। पल्लवी यानी विस्तार। यह संगी और नृत्य दोनों पर बराबर लागू होता है। यह विशुुद्ध नृत्य प्रस्तुति थी। इसके बाद अन्वेषा महंत ने वंदना और रामदानी एवं प्रकृति पुरुषा की सत्त्रिया प्रस्तुति दी। जबकि प्रकृति पुरुष नृत्य प्रस्तुुति कृष्ण, राधा एवं गोपियों पर केंद्रित थी। इसके बहाने आत्मा-परमात्मा के मिलन को दर्शकों के सामने प्रस्तुत किया गया। कविता ठाकुर ने गंगा अवतरण की कथा को नृत्य के जरिए प्रस्तुत किया। वहीं जयाप्रभा ने मोहिनीअट्टम प्रस्तुति दी। जबकि समारोह की अाखिरी प्रस्तुत रानी खानम की थी। जिन्होंने यमुना आरती को कथक के जरिए जीवंत बना दिया। यमुना आरती यमुनाष्टकम पर आधारित थी। यमुना भक्तों की सभी इच्छाएं पूरी करने में सक्षम है। यमुनोत्री से निकलकर वो हजारों किलोमीटर का सफर तय कर प्रयागराज में संगम का हिस्सा बनती है। उनकी यहां तक की यात्रा के दौरान फ्लो में बदलाव होते रहते हैं। नदी प्रदूषण से जूझ रही है। कई जगह प्रदूषण के चलते धारा प्रवाह भी मुश्किल होता है। लेकिन नदी की धारा रुकती नहीं है, किसी अन्य तरफ से अपना रास्ता बना लेती है। नदी का आखिरी पड़ाव डेल्टा होता है। ठीक इसी तरह इंसानी जिंदगी में भी कठिनाइयां आती है। कुछ बहुत मुश्किल होती हैं। लेकिन जिंदगी का सफर चलता रहता है। इन सभी भावों को कथक के जरिए बड़ी संजीदगी से प्रस्तुत किया गया।

Monday, August 12, 2019

जब नेहरू के आदेश पर बीजू पटनायक ने इंडोनेशिया में जबरिया उतार दी डैकोटा प्लेन

15 august 1947 congress conference 

देश आजादी की डोर में बंध रहा था। सन 1947 में पुराने किले की एशियन कांफ्रेंस को राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने संबोधित किया। भारत कोकिला सरोजिनी नायडू ने उसकी अध्यक्षता की। अंग्रेजों ने भी किसी तरह की बाधा नहीं डाली। कांफ्रेंस का पूरा विचार, परिकल्पना नेहरू जी की थी। एशिया के उन सब देशों के स्वतंत्रता संग्राम सेनानी आए थे जो अपने देश में ब्रिटिश, डच या फ्रांसीसी आततायी हुक्मरानों से जूझे थे। इससे भी पहले की स्वतंत्रता का तिरंगा भारतीय आकाश में लहराता नेहरु पूरी एशिया में नव जागरण का शंख फूंकना चाहते थे।
https://en.wikipedia.org/wiki/Jawaharlal_Nehru

 इस कार्यक्रम में एक बड़ी रोमांचक घटना घटी, जिसने पूरी दुनिया को चौंका दिया। दरअसल, इंडोनेशिया सैकड़ों वर्षों से डच कालोनी थी। हालैंड ने वहां के स्वतंत्रता संग्राम सेनिकों और सेनानियों को जेलों में बंद कर रखा था। प्रार्थना करने पर भी उन्होंने सुहार्तो को,जो उस समय स्वतंत्रता आंदोलन के सर्वोच्च नेता थे, भारत आने की इजाजत नहीं दी थी। कार्यक्रम स्थल पर तनाव था। तभी एक अप्रत्याशित घटना घटी। एक नवयुवक सामने आया। पंडित जी उसे अच्छी तरह जानते थे। वह नवयुवक था बीजू पटनायक। जी हां, आज उड़ीसा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक के पिता बीजू एक दक्ष पायलट थे। उन्होंने नेहरू जी से कहा कि यदि आप आज्ञा दें तो वह एक इंडियन डैकोटा प्लेन में जाकर सुहार्तो और उनके एक दे साथियों को उसी प्लेन में जेल से उड़ाकर ले आएंगे। इतना दुस्साहस, इतना आत्मविश्वास जो दुनिया भर में फैले डच साम्राज्य को ललकारने को तैयार था। आज्ञा मिली, और वह हो गया जिसकी डच शासको ने भी कल्पना नहीं की थी। इंडोनेशिया(शायद जकार्ता) की जेल के खुले मैदान में बीजू का छोटा जहाज उतरा और सुहार्तो को ले उड़ा। डच अधिकारी तो बहुत ज्यादा सोच भी नहीं पाए। एंटी एयर क्राफ्ट तोपों ने जहाज को उड़ा देने के लिए पोजीशन ले ली थी। इशारे भर की देरी थी। लेकिन तभी नेहरू सरकार की चेतावनी डच अधिकारियों को सुनाई दी। उन्हाेने कहा कि यदि बीजू के जहाज को कुछ भी हुआ तो भारत के हवाइ अडडो पर खड़े डच विमान पायलट सहित या तो जब्त कर लिए जाएंगे या फिर उड़ा दिए जाएंगे। नेहरू उस समय वायसराय की अंतरिम सरकार के उपाध्यक्ष थे। फिर क्या था, बीजूू अपने जहाज संग दिल्ली आए और सुहार्तो कांफ्रेंस में शामिल हुए। हां, इस घटना के बाद दिल्ली में जब यह काफ्रेंस हुई तो कफ् र्यू लगा दिया गया।
#independenceday
#15august1947



Saturday, August 10, 2019

दिल्ली में 15 अगस्त 1947 को ऐेसा था माहौल

आजादी की खुशबू फिजाओं में फैली थी। ये सुगंध हर किसी को दिल्ली की गलियों में खींचकर ले आ रही थी। चौक चौराहों पर देशभक्ति के तराने बज रहे थे। लाउडस्पीकर का शोर दूर से ही रोमांचित करता था। बड़े-बुजुर्गों की टोली बच्चों को कंधों पर बैठाए लाल किले की तरफ जा रही थी। दुकानों पर सामानों की खरीद पर आफरों की बरसात थी। खुली हवा में सांस लेने की खुशी दिल्लीवालों के चेहरे पर साफ झलक रही थी लेकिन लाल आंखे ये बताने के लिए काफी थी कि रात जागते हुए गुजरी है। आजादी, विभाजन का दंश देकर गई थी। अपनों को डरे सहमे हालत में सरहद पार जाते देखना दिल्लीवालों के लिए कलेजा कटाने वाला था। हर कोई गम और खौफ में जी रहा था लेकिन आजादी के बाद पहले स्वतंत्रता दिवस के स्वागत में भी दिल्ली ने कोई कोर कसर नहीं छोड़ी थी। लाल किला गुलजार था। पूरी दिल्ली मानों दुुल्हन की तरह सजाई गई थी। यह पूरा माहौल आज भी किताबों, इतिहासकारों के जेहन में कैद है। 

https://en.wikipedia.org/wiki/Independence_Day_(India)

इतिहासकार सोहेल हाशमी कहते हैं कि सन 1947 का दिल्ली बहुत ही अलग शहर था। शाहजहानाबाद, जिसे देलही या दिल्ली के नाम से जाना जाता था। एक ऊंची दीवार के भीतर बसा हुआ था। जो उत्तर में सिविल लाइन्स और माल रोड, किंग्सवे कैंप तक फैली हुई थी। जहां 1911 के दरबार को किंग जॉर्ज पंचम और रानी मैरी को भारत के सम्राट और महारानी के रूप में सेलिब्रेट करने के लिए आयोजन किया गय था। दक्षिण में और शाहजहां के शहर से अलग नई दिल्ली थी, पश्चिम में और शहर की दीवार के बाहर पहाड़गंज, करोल बाग और सदर बाज़ार और पूर्व में यमुना नदी थी जिसके पार शाहदरा की पुरानी बस्ती थी। जमीन से निकली चट्टानें, प्राचीन गांव कृषि भूमि और पुराने शहरों के खंडहर मसलन तुगलकाबाद, पुराना किला और सिरी आदि के खंडहर थे। 3 जून 1947 को विभाजन की घोषणा हुई। ज्ञानेंद्र पांडेय अपनी किताब रिमेंबरिंग पार्टिशन में लिखते हैं कि विभाजन की घोषणा के बाद से ही दिल्ली में हड़कंप मच गया। करीब 3 लाख 30 हजार मुस्लिम दिल्ली से पाकिस्तान गए। इस दौरान दिल्ली की आबादी में 3 लाख 50 हजार कमी दर्ज की गई। सोहेल हाशमी कहते हैं कि मौलाना अबुल कलाम आजाद एक पब्लिक रैली को संबोधित कर रहे थे। इसमें मुसलमानों की तादात ज्यादा थी। वो लोगों से कह रहे थे कि यह उनकी मातृभूमि है। इसे छोड़कर मत जाएं। लेकिन हकीकत यह थी कि जब वो ऐसा कह रहे थे तो सुनने वालों में से सैकड़ों ने पाकिस्तान जाने का मन बना लिया था। खैर इसी समय के दरम्यान करीब साढ़े चार लाख से ज्यादा हिंदू, सिख शरणार्थी पंजाब, सिंध और नार्थ इस्ट फ्रंटियर से दिल्ली आए। इससे िदिल्ली की आबादी बहुत बढ़ गई। जब दिल्ली में बड़ी संख्या में शरणार्थी आए तो यहां रहने, खाने से लेकर नौकरी समेत अन्य समस्याएं भी सिर उठाने लगी। लेकिन सबसे पहली जो समस्या सामने आयी वो थी रहने की। पुरानी दिल्ली के समुदाय विशेष कालोनियों में लोग नहीं चाहते थे कि उनके यहां शरणार्थी रुके। मुस्लिम बस्तियों में रहने वाले भी शरणार्थियों से डरे सहमे थे। यही वजह थी कि वरिष्ठ नागरिकों का एक संगठन जाकर महात्मा गांधी से मिला एवं उनसे पंडित जवाहर लाल नेहरू के जरिए गृह मंत्री को कहलवाया कि वो पुरानी दिल्ली के नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करे। इसलिए, शरणार्थियों को नए इलाकों में बसाया गया। 
शरणार्थी सभी उपलब्ध स्थानों पर बसाए गए। पुरानी इमारतों में, सुनसान मस्जिदों में, मध्ययुगीन ढांचों में, खुले मैदानों में और शाहजहांनाबाद के चारों ओर दीवार की मेहराबों, छज्जे के नीचे, पुरानी इमारतें थीं। बहुत जल्द, मेहर चंद खन्ना को पुनर्वास के लिए मंत्री नियुक्त किया गया और सभी प्रकार की योजनाओं को जल्द से जल्द पूरा करने, स्कूलों को शुरू करने, नौकरी खोजने, मुआवजे का दावा करने और लापता लोगों को खोजने का जिम्मा सौंपा गया। विभाजन की इसी त्रासदी के दौरान वरिष्ठ नेता विजय कुमार मलहोत्रा का परिवार भी दिल्ली आया था। कहते हैं, हमारा परिवार जब दिल्ली आया तो रहने के लिए जगह नहीं थी। यहां वहां भटकना पड़ा। पंचकुइयां रोड पर एक खाली मकान पड़ा था, जिसमें हमने रहना शुरू किया। बाद में निजामुद्दीन में 6हजार रुपये में घर में शिफ्ट हुए। 

गत्ता कालोनी बनाई गई
इतिहासकार बताते हैं कि कैंप, गुरुद्वारा, मंदिर, स्कूल ही नहीं सेना के कैंप तक में भी शरणार्थी बसाए गए। बावजूद इसके शरणार्थियों के लिए जगह की कमी थी। इसलिए यहां गत्ते की मदद से अस्थाई आवास बनाए गए। ये आवास पूरी दिल्ली भर में बनाए गए थे। लेकिन सबसे ज्यादा गत्ते के मकान लाल किले के आसपास बनाए गए थे। इन्हें लोग गत्ता कालोनी कहकर  पुकारते थे। इसे पहचानने के लिए सीरियल नंबर दिया गया था। डीडीए के पूर्व कमिश्नर एके जैन बताते हैं कि हालात थोड़े सुधरे तो शरणार्थियों को पक्का आश्रय देने पर काम शुुरू हुआ। स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के नाम पर दिल्ली भर में 36 स्थायी पुर्नवास कालोनियां बसाई गई। जिनमें लाजपत नगर, राजेंद्र नगर, पटेल नगर, तिलक नगर, मालवीय नगर आदि को खेतों में, रिज एरिया में बसाया गया। हर आवंटी को जिसका घर 60 से 80 स्कवायर यार्ड प्लॉट पर बना था। दस सालों तक 12.30 रुपये बतौर किराया दिए। स्थायी आवास मिले तो कारोबार ने भी रफ्तार पकड़ी। पाकिस्तान, पंजाब से आने वाले शरणार्थियों ने दिल्ली में कारोबार शुरू किया। 
एमडीएच के प्रबंध निदेशक महाशय धर्मपाल गुलाटी भी इसी दौर में दिल्ली आए थे। कहते हैं कि हिंदुस्तान के बंटवारे के बाद हमारा पूरा परिवार सियालकोट से दिल्ली महज 1500 रुपये लेकर आया था। यहां परिवार को पालने के लिए तुरंत कार्य करने की जरूरत थी। सबसे पहले एक तांगा खरीदा और नई दिल्ली से कुतब रोड व पहाड़गंज तक चलाना शुरू किया। काफी देर तक साहब..दो आने सवारी, दो आने सवारी, चिल्लाता रहता था, लेकिन सवारी नहीं मिलती थी। मैं हताश हो गया था। इसके बाद मैंने सोचा कि इससे जिंदगी नहीं चलने वाली है। मैंने तांगा बेच दिया और अजमल खान रोड पर महाशय दी हट्टी के नाम से मसाले की दुकान खोल ली। इसके बाद सफर की शुरुआत हुई और आज पूरे देश में एमडीएच की 22 फैक्ट्रियां हैं। आजादी के पहले पड़ोसी राज्यों के विभिन्न शहरों से कारोबारी आते एवं थोक में सामान खरीदने के बाद उंट पर लादकर गंतव्य तक जाते। लेकिन शरणार्थियों  के आने के बाद हालात और बेहतर हुए। सन 1964 का इंडस्ट्रियल सर्वे बताता है कि 1945 से 1951 के बीच रजिस्टर्ड फैक्ट्रियों की संख्या 227 से बढ़कर 431 हो र्ग। 1945 के पहले दिल्ली में तीन साइकिल मैन्यूफैक्चरिंग इंडस्ट्री भी थी। जो 1951 में बढ़कर 7 हो गई। 

दिल्ली की एक शाम खुसरो-कबीर के नाम

दिल्ली में ऐसे बहुत कम कार्यक्रम होते हैं जिनमें दर्शक समाप्ति तक कुर्सियों से ना केवल चिपके रहे बल्कि तालियों का जोश भी ठंडा ना पड़े।  में ऐसे ही एक कार्यक्रम का गवाह बना। जो दिल को सुुकून देने वाला था। हजरत अमीर खुसरो अौर कबीर में भले ही दो सदियों का अंतर हो लेकिन दिल्ली की एक सुहानी शाम में दोनों एक छत के नीचे थे। दोनों ही की जनसाधारण से जुड़ी रचनाएं उन्हें आज भी प्रासंगिक बनाती है। शायद यही वजह है कि कमानी ऑडिटोरियम में खुसरो-कबीर पर आयोजित समारोह में संगीतप्रेमी उमड़ पड़े। ऑडिटोरियम खचाखच भरा था। ऐसे माहौल में जब खुसरो और कबीर की रचनाओं को एक से बढ़कर एक बेहतरीन फनकारों ने प्रस्तुत किया तो शाम यादगार बनती चली गई। दर्शक हर रचना के साथ भावों के सागर में डूबते जा रहे थे। युवा फनकारों की कबीर और खुसरो प्रस्तुति दर्शकों को पसंद आयी। तीन भागों में बंटे कार्यक्रम की शुरूआत नई पीढ़ी के कलाकारों की प्रस्तुति से हुई। जबकि दूसरे सत्र में कबीरपंथी प्र्रस्तुति ने इसे खास बनाया। जबकि कार्यक्रम का समापन चिश्ती ब्रदर्स की सूफी कव्वाली से हुआ।
शुरूआत अर्चिता भट्टाचार्या द्वारा अमीर खुसरो का कलाम गाने से हुआ। अर्चिता ने
बन के पंछी भए बावरे ऐसी बीन बजाई संवारे
तार तार की तान निराली झूम रही सब वन की डारी।। गाया तो दर्शक भी झूमने लगे। संगीत का जो यह सुरीला सफर शुरू हुआ वह एक के बाद एक पड़ाव से गंतव्य तक गया। अर्चिता द्वारा अलाप लिए जाने के दौरान दर्शक इस कदर भावुक हो जाते कि अपने सीट पर खड़े होकर तालियां बजाते। सफर जब--हे री सखी
मोरे पिया घर आए
मैं तो खड़ी थी अास लगाए
मेंहदी कजरा मांग सजाए
देखि सुुरतिया अपने पिया की
हार गई, तन मन हो।। से होकर गुजरा तो दर्शक भी भाव विह्वल हो गए। अर्चिता ने--चदरिया झीनी रे झीनी भी गाया। बकौल अर्चिता, क्लासिकल, गजल गाती हैं। लेकिन जब कबीर और खुसरो को गाती है तो एक अजब ही अनुभूूति होती है। दिल को गाना गाते समय सुकून मिलता है जिसे शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता है।
खुसरो-कबीर कार्यक्रम में अगली प्रस्तुति गायत्री अशोकन की थी। केरल में जन्मी और प्लेबैक सिंगिग को बतौर करियर चुनने वाली गायत्री के लिए यह प्रस्तुति बहुत ही खास थी। कहती हैं, दिल्ली की ऑडिएंश् के सामने कबीर और खुसरो की रचनाओं को गाना एक सुखद अनुभव है। कई मलयालम फिल्मों गाना गा चुकी गायत्री की पहली प्रस्तुति ही दर्शकों के दिल को छू गई। गायत्री ने---च्बहुत कठिन है डगर पनघट की
कैसे भर लाऊं, मथुरा से मटकीज् गाया। खुसरो की इस रचना को गायत्री ने जब अपने अंदाज में गाया तो दर्शक दीवाने हो गए। इन्होंने जब--कबीर की रचना अपना कोई नहीं सुनाया तो ऐसा लगा जिंदगी की सच्चाई आंखों के सामने आ गई। मायाजाल में उलझे इंसान को सही राह दिखाती यह प्रस्तुति शानदार थी। गायत्री ने मोहे अपने रंग में रंग दे रंगीले, साहिब मोरा महबूब इलाही।। भी बड़ी तन्मयता से गाया।
संगीत का यह सफर अब तक अपनी लय पकड़ चुका था। कार्यक्रम की तीसरी प्रस्तुति दिल्ली की विद्य्रा शाह की थी। सिंगर, लेखक विद्या शाह की बुलंद आवाज में जब दर्शकों ने मन लागा मेरा यार फकीरी में, सुना तो ऑडिटोरियम तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा। हद और अनहद के बीच का फर्क भी विद्या शाह ने बड़ी बखूबी गाने के जरिए दर्शकों को समझाया।
कबीर भी मुरली की धून सुुनकर रह नहीं पाते थे। उन्हें भी धुुन अपनी तरफ खींचती थी। इसी भाव विद्या ने
च्हमसे रहा ना जाए, मुरलिया की धुन सुन केज् के जरिए दर्शकों के समक्ष प्रस्तुत किया।
https://en.wikipedia.org/wiki/Vidya_Shah


कबीर पंथी
कार्यक्रम अब अपने पूरे शबाब पर था। दर्शक गानों के जरिए कबीर और खुसरो की सोच को जीने लगे थे। महसूस कर रहे थे। कबीरपंथी सेशन में प्रसिद्ध लोकगीत गायक प्रहलाद सिंह टिपनिया को आना था लेकिन वो किन्हीं कारणों से आ नहीं पाए। जब यह घोषणा दर्शकों के सामने की गई तो कई लोग मायूस हो गए। दरअसल, प्रहलाद सिंह को सुनने बड़ी संख्या में दर्शक दूर दराज इलाके से आए थे। लेकिन प्रहलाद सिंह की कमी उनके बेटे और भाई ने नहीं होने दी। इन्होंने इतनी खूबसूरती से कबीर के संदेशों को गाया कि दर्शक भक्ति रस में सराबोर हो गए। समूह ने जरा हल्के गाड़ी हांको, मेरे राम गाड़ी वाले गाया तो ऐसा लगा कि जिंदगी की गाड़ी को राम का सहारा मिल गया है। कार्यक्रम के आखिर में चिश्ती ब्रदर्स ने कव्वाली गाया। जिसपर दर्शक जी भर के झूमे।

Friday, August 9, 2019

चिट्ठी आयी है...

चिट्ठी आयी है..पीले पोस्टकार्ड पर अक्षर उभरे हैं। कई पोस्टकार्ड पर लिखते समय आंसूओं की बूंद टपकने से अक्षर धुंधले हो चुुके हैं। पोस्टकार्ड, जो सैनिकों की वीरता के किस्से से भरे है। हर चिट्ठी शहादत की कहानियां समेटे हैं। अपनों को खोने का गम भी है और देश के लिए बलिदान होने का गर्व भी। इन चिट्ठियों ने सैकड़ों मीलों का सफर तय किया है। भारत के लगभग हर राज्य से आयी हैं। इनमें झुग्गी बस्तियों के बच्चों की भावनाएं भी है और वरिष्ठ कलाकारों की भावुक सोच भी। तभी तो ललित कला अकादमी में लगी पोस्टकार्ड प्रदर्शनी में इन चिट्ठयों को देखने, पढ़ने के लिए दिल्ली समेत एनसीआर से लोग खींचे चले आ रहे हैं। 300 से भी ज्यादा वरिष्ठ कलाकारों की 498 चिट्ठीयों में देशभक्ति की भावना कूटकर भरी है। करीब पांच महीने की मेहनत और लगन से तैयार इस प्रदर्शनी की उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भी तारीफ कर चुुके हैं।

हर राज्य का प्रतिनिधित्व
क्यूरेटर भूपेंद्र कुमार अस्थाना कहते हैं कि फरवरी महीने में हमने इस प्रोजेक्ट पर काम करना शुरू किया। जिसका नाम था भारतीय सेना। हम सेना को केंद्र में रखकर कुछ ऐसा करना चाहते थे जो लोग हमेशा याद रखे। फिर, चिट्ठी का ख्याल आया। क्यों कि सेना और चिट्ठी का अटूट नाता है। इसी बहाने इंटरनेट की लत से जूझ रही युवा पीढ़ी को लगभग विलुुप्त होती जा रही चिट्ठियों संग दोस्ती का अवसर मिलेगा। बस यही सोचकर हमने पहले पहले कुछ वरिष्ठ कलाकारों को सेना के जवानों को समर्पित पोस्टकार्ड लिखने को कहा। इसके बाद हमने सोशल मीडिया पर भी पोस्ट कर लोगों से पोस्टकार्ड भेजने को कहा। बहुत बड़ी संख्या में लोगों ने हिस्सा लिया। हम लखनऊ की झुग्गी बस्ती में भी गए। वहां बच्चों को पोस्टकार्ड दिया और उनसे अपनी भावनाओं का इजहार करने को कहा। उन्होंने इतनी खूबसूरत ड्राइंग के साथ जो संदेश लिखे वो दिल को छू जाने वाले हैं। यहां तमिलनाडू, असम, मध्यप्रदेश, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, हिमाचल, दिल्ली, महाराष्ट्र समेत भारत के हर राज्यों से भेजी गई पोस्टकार्ड प्रदर्शित है।

वरिष्ठ कलाकारों ने लिखे पोस्टकार्ड
बकौल भूपेंद्र इसमें कवि, चित्रकार, काटूनिस्ट, फोटोग्राफर समेत विभिन्न कला क्षेत्रों के वरिष्ठों द्वारा लिखे पोस्टकार्ड प्रदर्शित हैं। यहां दिल्ली के हेमराज, रमा, अमित कुमार। जयपुर के विद्यासागर उपाध्याय, लखनऊ के जयकृष्ण अग्रवाल, राजस्थान के विनय कुमार, कार्टूनिस्ट मनोज वाजपेयी के पोस्टकार्ड है। जबकि नरेश सक्सेना, उर्मिल थपलियाल, सर्वेश अस्थाना, परितोष निगम,ममता त्रिपाठी, पुष्पेंद्र अस्थाना, बिकानेर के गोपाल ब्यास, त्रिलोच कालरा ने भी बड़े भावपूर्ण शब्दों में पोस्टकार्ड लिखे हैं।

भावुक पत्र
पुलवामा हमले से जुड़ा एक पोस्टकार्ड दर्शकों को भावुक कर देता है। यह पोस्टकार्ड दो दोस्तों की बातचीत है। जिसमें पुलवामा हमले के बाद एक दोस्त ने अपने सैनिक दोस्त से बातचीत लिखी है। इसमें लिखा है मेरा एक दोस्त है, बीएसएफ में, पुलवामा हमले के बाद उससे बात हुई थी। वो पं बंगाल में तैनात है। उसने कहा---
अभी गर्मी की छुट्टी में मिला था
परिवार की जिम्मेदारियों में व्यस्त था
पर सच कहूं वो मस्त था
परिवार की सेवा में भी और देशसेवा में भी
एक बार फिर, मैं देखता रहा
और सुुनता रहा
सिर्फ सुनता रहा।

अभिनंदन का अभिनंदन
यहां करीब आधा दर्जन एेसे पोस्टकार्ड है जो अभिनंदन की वीरता की कहानियों, उनके वंदन से भरे पड़े हैं। कलाकारों समेत बच्चों ने अभिनंदन की कलाकृति भी बनाई है। एक पोस्टकार्ड पर अभिनंदन एवं विमान की कलाकृति है जबकि एक अन्य में अभिनंदन का हंसता मुस्कुराता चेहरा है। इसके बारे में पूछने पर क्यूरेटर कहते हैं कि सेना के जवान की खासियत यही है। वो भले ही लाख विपत्तियों में हो लेकिन हमेशा मुस्कुराता रहता है। वो दर्द को सहकर देशवासियों की सुरक्षा में तल्लीन रहता है।

विपत्ति में च्पुुलज्
एक पोस्टकार्ड में सेना के जवान को एक पुल के रुप में दिखाया गया है। जवान के उपर से छोटे बच्चे-बड़े-बुजुर्ग आदि गुजर रहे हैं। यह तस्वीर दर्शाती है कि कैसे जवान हर मुश्किल घड़ी में हमारा सहारा बना है। बाढ़ आयी हो या फिर आंधी-तुफान, डिजास्टर हो। जवान आम लोगों की मदद के लिए सामने आते हैं। एक पोस्टकार्ड में बाढ़ के दिनों में सेना के जवान की मदद करती कलाकृति भी है। जवान जाति-धर्म से उपर उठकर व्यक्ति को कंधे पर बिठाकर पार करा रहा है। जबकि खुद वो कमर तक पानी में डूबा है।

रुको-झुको नहीं तुम
जवानों के लिए कई कविताएं वाली पोस्टकार्ड भी है। ऐसे ही एक पोस्टकार्ड पर लिखा है कि--मिला है मौका दिखा दो दमखम
कस लो मुट्ठियां
वीरों की संतान हो
भारत की शान हो
राष्ट्र तुम्हारा रहा पुकार
धर्म तुम्हारा बना आधार
रुको नहीं तुम, झुको नहीं तुम
जबकि एक अन्य पोस्टकार्ड पर बच्ची उषा लिखती हैं कि --
मेरे भारत देश के जवानों
आप ने दिया है खून की कुर्बानी
उंचा रहे आपका ख्याल और विचार
मेरे प्यारे जवान भाईयों।।
यहां कई ऐसे भी पोस्टकार्ड भी है जिनमें जवानों को शेर जैसे दिखाया गया है। युद्ध के दौरान जवानों की जिंदगी समेत जवानों के शहीद होने पर भावुुक माहौल को भी दर्शाते पोस्टकार्ड है।

पहाड़ में पोस्टकार्ड
एक जवान के परिवार के माहौल से रूबरू कराता है पहाड़ में पोस्टकार्ड। जिसमें कविता के बहाने पारिवारिक स्थिति को बड़ी संजीदगी से बयां किया गया है। लिखा है-
पोस्टकार्ड पर प्रेम पत्र
नहीं लिखे जाते थे, पर
हर अक्षर एक प्रेम ग्रंथ था
पापा,पढ़ने के बाद देर तक सहलाते रहते
मां की छाती से तो छूटता ही नहीं था पोस्टकार्ड
मैं छोटा था
मुझे बहुत प्यार लगता पोस्टकार्ड।।
एक पोस्टकार्ड पर जंग में हंसी हंसी अपनी जान देने वाले जवानों को श्रृदांजलि दी है। एक पोस्टकार्ड में जिसमें जवान की प्रतीकात्मक कैप दिखाया गया है। जो खून से सना हुआ जरुर है लेकिन कमल के फूल में खिले हैं। बहराइच के जिला उद्यान अधिकारी ने तो बकायदा कविता लिखी है। जिसमें वो लिखते हैं कि
ओ सैनिक
रोके से तू कहां रुकेगा
शीश तेरा कट जाए फिर भी कहां झुुकेगा
तेरा गौरव अमर रहे मां, हम दिन चार रहे न रहे।।
वहीं कई ऐसे पोस्टकार्ड है जिस पर अंतरिक्ष, आकाश, जल और थल में मजबूत होती भारतीय सेना की तस्वीरें है।

एहसासों की गठरी सा पोस्टकार्ड
यह पोस्टकार्ड बहुत ही खास है। इसमें एक परिवार की भावनाएं छिपी है। लिखा है---उम्मीद है तुम कुशल पूर्वक होगे।
लाल, तुम वतन की सेवा करना।
यहां मां-बहना खुश है।
छुट्टी मिले तो कुछ समय के लिए घर आना
संग समय बिताना
बाकि तुम खुद समझदार हो। पत्र मिले तो जवाब देना।



Saturday, August 3, 2019

ये वेश्या नहीं कलाकार हैं

Lavni folk artist life 

मौसम रुहानी था, आसमान में बादल घुुमड़ रहे थेे। ठंडी-मद्धम हवा बह रही थी। दिलली के स्टेन ऑडिटोरियम में घुप अंधेरा था। दर्शक सीट से चिपककर बैठेे थेे। थोेड़ी देर में स्टेज नीली मद्धिम रोशनी से नहा उठती है। एवं बाद में सफेद रोेशनी स्टेज पर एक घेरा सा बना लेती है। दर्शकों की बेचैनी बढ़ती जाती है। इस बीच घुंघुरुअों की आवाज पहले धीरे धीरे एवं बाद में तेज हो चुकी है। लाल, पीली साड़ी में नर्तकियां स्टेज पर आती हैं एवं फिर श्रृंगार रस की एक से बढ़कर एक प्रस्तुति से दर्शकों का दिल जीत लेती हैं। नर्तकियोंं का उत्साह, दर्शकों को बार बार तालियां बजाने पर विवश करता है। दर्शक बड़ी तन्मयता से लावणी में बनारस के पंडों और शराब छोड़ पत्नी के प्यार को महसूस करने वाले पति की संगीतमय कहानी सुन रहे थे और तालियां बजा रहे थे। नर्तकियां भी बड़ी संजीदगी से सैकड़ों साल पुरानी इस कला को दर्शकों से खचाखच भरेे आॅडिटोरियम में पेश कर रही थी। लेकिन हंसी-ठहाकें और श्रृंगार की सुर धारा के बीच दो दिवसीय मराठी फोल्क संगीत कार्यक्रम की कोशिश इन नर्तकियों की जिंदगी के उस स्याह पक्ष से भी दर्शकों को रूबरू कराना था। जिसमें इन्हें सिर्फ श्ंका भरी निगाहों से ही नहीं देखा जाता ब्लकि वेश्या तक समझ लिया जाता है। जबकि इनकी जिंदगी संघर्ष की वो दास्तां है, जिसे महसूस करने मात्र से ही आंखें डबडबा जाती हैं।



दो दिवसीय कार्यक्रम

इंडिया हैबिटेट सेंटर लोक संगीत सम्मेलन दरअसल विभिन्न राज्योंं के फोल्क संगीत को मार्डन युग में जिंदा रखने की कवायद है। जिसके तहत विभिन्न लोक कलाओं पर आधारित कार्यक्रम होते रहते हैं। इसी कड़ी में फोल्क म्यूजिक आफ महाराष्ट्र का आयोजन हुुआ। 20 एवं 21 जुलाई को इंडिया हैबिटेट सेंटर के स्टेन ऑडिटोरियम में आयोजित इस कार्यक्रमों का दर्शकों का जितना प्यार मिला वह लोकसंगीत के लिए भी शुभ संकेत हैं। पहले दिन शिवनादर यूनिवर्सिटी की एसोसिएट ्रप्रोफेसर एवं प्रसिद्ध म्यूजिशियन डॉ उर्मिला भिरडिकर ने हाल के वर्षों में महाराष्ट्र लोक कलाओं में अाए बदलाव एवं परिवर्तनों से दर्शकों को परिचित कराया। उन्होंने दर्शकों को लावणी पर किए अपने रिसर्च से भी अवगत कराया। जबकि दूसरे लोक कलाकारों ने संगीत बारी में लावणी प्रस्तुत किया। लावणी महाराष्ट्र की प्रसिद्द गान और नृत्य कला है। ढोलक की ताल पर थिरकती हुई, 9 गज की साड़ी पहनी हुई लावण्यमयी स्त्री का यह नृत्य जनसामान्य में, शहरों और गांवों में, बेहद लोकप्रिय है। धर्म, राजनीति, मुहब्बत और समाज जैसे संवेदनशील विषयों पर लावणी एक शृंगारिक कला प्रकार है जो मनोरंजन के माध्यम से अपना सन्देश प्रेक्षकों तक बखूबी पहुंचाता है।

दर्शकों के दिल में उतर गया संगीत बारी
दूसरे दिन यानी 21 जुलाई की रात सात बजे संगीत बारी की प्रस्तुति दर्शकों के दिल में उतर गई। संगीत बारी, संगीत-नृत्य और थियेटर का सम्मिश्रण है। संगीत बारी यानि बारी-बारी से संगीत की प्रस्तुुति। इसमें पहली प्रस्तुति संगीत नाटक अकादमी से सम्मानित शकुंतला नगरकार की थी। शकुंतला नेे काशी के ब्राम्हण प्रस्तुति दी। जिसमें काशी के मंदिरों के पंडों की जिंदगी को संगीत एवं नृत्य के जरिए प्रस्तुत किया गया। पंडे, किस तरह भक्तों को रोकते हैं, उनको विभिन्न् पूजा, चढावों के बहाने से मोलभाव करते हैं। गीत में पंडो के नहाने, पीतांबर पहनने का भी वर्णन था। सूर्य नमस्कार करने की प्रकि्रया का वर्णन बहुत ही शानदार था। पूरी प्रस्तुति हास्य का सम्पुुट लिए हुई थी। जिसे सुनते समय दर्शक हंस-हंसकर लोेटपोट हो गए। जबकि दूसरी प्रस्तुति पुष्पा सतरकार की थी। पुष्पा की आनंदझाला एक पत्नी की भावनाओं का मिश्रण थी। पत्नी बहुत खुश थी एवं लावणी प्रस्तुत कर रही थी। क्यों कि उसका पति पहले बहुत दारु पीता था। जिसकी वजह से उसकी बुद्धि भ्रष्ट हो गई थी। शरीर गलता जा रहा था, हड्डियां दिख रही थी। लेकिन अब उसने दारु छोेड़ दी है और वो अपने पत्नी को मानने लगा है। इसलिए पत्नी खुश थी। गाने के जरिए कहती हैं कि पहले तो ऐसा लगता था कि पति भौरा हो और दारु फूल। पति, फूल के इर्दगिर्द ही दिनभर मंडराता रहता था। लेेकिन दारु छोड़ने के बाद पति अब उसे ही पूरा समय देता है। दारु पीने के नुकसान एवं एक परिवार की व्यथा को जिस तरीके से संगीत बारी के जरिए प्रस्तुत किया गया, उसे दर्शकों ने सीट पर खड़े होकर तालियां बजाते हुए सम्मान से नवाजा। इस संगीतमयी शाम की आखिरी प्रस्तुति एक हिंदी गजल थी।
तुमने जो मेरी कब्र पर, आकर यूं मुस्कुरा दिया
बिजली चमक कर गिर पड़ी, सारा कफन जला दिया।।
संगीत बारी के लेखक भूषण कोरगांवकर कहते हैं कि संगीत बारी वह प्रयास है जो दर्शकों को इन नर्तकियोंं की जिंदगी को नजदीक से समझने एवं जानने का मौका देता हैं। हमारी कोशिश है कि इन्हें समाज में वेा इज्जत और सम्मान मिले जो एक कलाकार को मिलना चाहिए। दरअसल, आज भी इन्हें गलत नजरों से देखा जाता है। संगीत बारी है क्या? इसके जवाब में भूषण कहते हैं कि जैसे उत्तर भारत में कोठे आदि हाेते थेे। उसी तरह महाराष्ट्र में संगीत बारी होता है। जिसमें एक विशेेष समुदाय की महिलाएं नृत्य प्रस्तुत करती हैं। इसे डोंगवारी, भातु, कोल्हाटी जाति की ज्यादातर औरतेंं करती हैं। इसमें तीन वाद्ययंत्रों का इस्तेमाल होता है। पहला, पांव से बजाने वाली बाजे की पेटी, दूसरा तबला और तीसरा ढोेलक। सैकड़ों साल पुरानी यह कला पहले राजा, महाराजाओं, सरदारों और रईसों की मनोरंजन के लिए प्रस्तुत की जाती थी।
संगीत बारी से अपने जुड़ाव के बारे में भूषण बताते हैं कि शुरुआत में मैं नाटक, शास्त्रीय संगीत और नृत्य पसंद करता था। मुझे सांस्कृतिक दृष्टि से लावणी के बारे में हीन भावना थी, कि हमारे महाराष्ट्र में भरतनाट्यम या कत्थक जैसे परिष्कृत नृत्य के प्रकार क्यों नहीं हैं। तमाशा (लावणी) नृत्यप्रकार तो थोड़ा असभ्य ही लगता था! एक बार मुझे संगीत बारी परम्परा की नृत्यांगना की लावणी देखने का मौका मिला। कितना सुन्दर था वह अनुभव! मुझे मेरी गलत धारणाओं पर तरस आया। शृंगारिक और कामुक होते हुए भी वह शालीनता की कोई सीमा पार नहीं कर रहा था। मैं भरतनाट्यम, कत्थक और लावणी में समानताएं ढूंढने लगा। अपनी पार्टनर सावित्री के साथ संगीत बारी के कलाकारों से मिला, एवं बाद में डॉक्यूमेंट्री और किताबें भी लिखी।
बकौल भूषण, चूंकि संगीत बारी की नर्तकियां शादी नहीं करती है। ऐसा माना जाता है कि घुघरुं पहन ली तो मान लोग कि घुुघंरुु से ही शादी हो गई। ये अपने मर्जी से लिव इन में रह सकती है। इनका परिवार मातृसत्तात्मक है। इसलिए आम लोगों में यह भ्रांतियां है कि ये नाच गाना करती है। ग्राहकों के साथ सोती है। जबकि हकीकत में ऐसा कुछ नहीं है। लोगों की इसी धारणा को बदलने एवं नर्तकियों को उचित सम्मान दिलाने के लिए पिछले चार सालों से संगीत बारी का आयोजन कर रहे हैं। इसमें उन्हीं कलाकाराें को बुलाया जाता है जो वास्तविक जिंदगी में भी संगीतबारी कर रही है।


महिला संघर्षों की कहानी सुनाती प्रदर्शनी

Artworks telling the story of women's struggle in India अक्टूबर माह में  नई दिल्ली में मूर्तियों व पेंटिंग्स की एक ऐसी प्रदर्शनी लगन...